झालावाड़ की सविता घुता ने महिला सशक्तिकरण की एक नई मिसाल पेश की है। वह पेशे से ब्यूटीशियन हैं और भैसोदा मंडी में अपना ब्यूटी पार्लर चलाती हैं। सविता पिछले 4 सालों से महिलाओं और युवतियों को निशुल्क ब्यूटी पार्लर का प्रशिक्षण दे रही हैं। उन्होंने अब तक 500 से अधिक महिलाओं को इस हुनर में माहिर बनाया है। स्कूल और कॉलेज की छात्राओं के लिए यह कोर्स गर्मियों की छुट्टियों में चलाया जाता है। सविता घरेलू जिम्मेदारियों के साथ-साथ समाजसेवा में भी सक्रिय हैं। उनका यह प्रयास प्रधानमंत्री के कौशल विकास और आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी मजबूती दे रहा है। सविता के प्रशिक्षण से हुनरमंद बनी कई महिलाएं आज विभिन्न स्थानों पर अपनी सफलता की कहानियां लिख रही हैं। सविता का मानना है कि हर महिला को अपनी जिद और जुनून से खुद की कहानी लिखनी चाहिए। उनका यह कार्य नारी सशक्तिकरण की दिशा में एक सार्थक पहल है। वह बिना किसी शुल्क के महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का काम निरंतर कर रही हैं। महानगर से आई महिला ने गांव में बनाई पहचान
सविता घुता इंदौर जैसे बड़े महानगर की रहने वाली थीं। शादी छोटे से कस्बे भवानीमंडी में हुई। तब परिवार वालों और लोगों ने बहुत बातें बनाई कि छोटे से गांव में शादी करना बेवकूफी है। उनका कहना है कि एक बेटी का अपने पापा के प्रति अटूट विश्वास ने ही उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया है। सविता घुता ने अपने हुनर को हमेशा बांटते हुए फ्री ब्यूटी कोर्स कराकर कई महिलाओं, युवतियों और निराश्रित गृहणियों को हुनर सिखाया है, जो आज खुद सेल्फ डिपेंड होकर अपना बिजनेस कर रही हैं। सामाजिक और धार्मिक कार्यों में भी सविता हमेशा आगे रहती हैं। समय-समय पर समाजहित और जनहित के कार्य करती रहती हैं। नगर के त्रिवेणीधाम मंदिर समिति की महिला मंडल अध्यक्षा भी हैं। वहीं एक स्थानीय एनजीओ राजस्थान नागरिक मंच की सेकेटरी के पद पर भी कार्यरत हैं। वह महिलाओं के शोषण और घरेलू हिंसा के सख्त खिलाफ हैं। समय-समय पर क्षेत्र में किए गए सराहनीय कार्यों के लिए उन्हें सम्मानित भी किया है। शिक्षा का सफर, सामाजिक भेदभाव भी आया आड़े
सविता घुता ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गृहनगर इंदौर से की है। उसके बाद स्नातकोत्तर के बीच में ही उनकी शादी कर दी गई। जिसके बाद जैसे तैसे उन्होंने बीए अंतिम वर्ष किया। उसके बाद गृह क्लेश का सामना करना पड़ा। दो बच्चों को जन्म देने के बाद उन्होंने जयपुर जाकर ब्यूटी वेलनेस में एडवांस पीजी किया। इन सब में उनके माता-पिता और पति का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। उनका कहना है कि वे खटीक समाज से हैं। अक्सर उन्हें अपनी जाति के कारण जातिगत भेदभाव झेलना पड़ा। वे बताती हैं कि आज के समाज में महिला-पुरुषों में असमानता का भाव तो खत्म होने लगा है। पर जातिगत भेदभाव समाज के लिए विडंबना बनी हुई है।


