टीचर की पिटाई से बचने को हॉकी पकड़ी, कभी अवॉर्ड के पीछे नहीं भागा

स्थानीय रमन इनक्लेव में रहने वाले बलदेव सिंह को केंद्र सरकार ने पद्म श्री अवॉर्ड देने का ऐलान किया गया है। वह शहर के पहले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें द्रोणाचार्य और पद्म श्री अवॉर्ड दोनों मिले हैं। उनके चयन पर लुधियाना स्पोर्ट्स वेलफेयर एसोसिएशन ने खुशी जताई। कोच बलदेव सिंह ने बताया, ऐलान होने से पहले सुबह मेरे पास मिनिस्ट्री से फोन आया और मेरा नाम, पता पूछा गया था। जब मैने उसने पूछा, नाम और पता क्यों ले रहे हैं तो बताया, शाम को पता चल जाएगा। शाम को टीवी और सोशल मीडिया पर पता चला कि उन्हें अवॉर्ड मिला है। उन्होंने कहा, सोचा नहीं था कि अवॉर्ड ऐसे मिल जाते हैं। मैने कोई आवेदन नहीं किया था। बता दें बलदेव सिंह लुधियाना स्पोर्ट्स वेलफेयर एसोसिएशन के चीफ पैट्रन भी हैं। एसोसिएशन के प्रधान अमरीक सिंह मिन्हास, चेयरमैन सुखविंदर सिंह, जनरल सेक्रेटरी जगरूप सिंह, ओलिंपियन हरदीप सिंह ग्रेवाल ने उन्हें बधाई दी। टीचर ने पुरानी टूटी हुई हॉकी खेलने को दी, उसी से खेलना शुरू किया “1969 में मैं मालवा सीनियर सेकेंडरी स्कूल में नौवीं कक्षा में पढ़ रहा था। स्कूल में एक दौड़ प्रतियोगिता में 100 स्टूडेंट्स के बीच मैं फर्स्ट आया। स्कूल की हॉकी टीम बनी तो टीचर ने मुझे पूछा, हॉकी खेलनी है। मैने भी सहमति दे दी। लेकिन दो दिन बाद ही छोड़ दी। ट्रेनिंग पर नहीं गया तो टीचर ने एक महीने बाद पूछा, हॉकी क्यों छोड़ी। मैंने कहा, मेरे पास हॉकी ही नहीं है। टीचर ने मुझे पुरानी हॉकी दी, वह भी टूटी थी। उसी से खेलना शुरू कर दिया। मेरा स्कूल हॉकी को लेकर प्रसिद्ध था। हॉकी में जाने का एक कारण यह भी था। सुबह स्कूल में दो पीरियड जो होते थे। उसमें टीचर पीटते बहुत थे। उनसे बचने के लिए हॉकी शुरू की। स्कूल टूर्नामेंट जीता। हमारी टीम ने पंजाब के स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट जालंधर की टीम को हराया। पंजाब में नंबर वन आ गए। मैंने कई टूर्नामेंट खेले और हॉकी को लेकर सीरियस हो गया। एक-दो साल फेल भी हुआ। पीयू में ग्रेजुएशन की। ओपन हॉकी टूर्नामेंट देशभर में खेलता रहा। मेरे दोस्त सुरजीत सिंह के कहने पर एनआईएस में 1979-80 में हॉकी कोच का कोर्स किया। फिर मैं नामधारी हॉकी टीम भैणी साहिब का कोच बना। पहले साल ही टीम ऑल इंडिया नेहरु हॉकी जूनियर कप जीत गई। बेस्ट कोच का अवॉर्ड मिला। जुलाई 1981 में हरियाणा स्पोर्ट्स में कोच पद ज्वाइन किया। 1982 जनवरी में शाहबाद में सवा चार साल कोच के तौर पर काम किया। नए मैदान बनाए। संदीप कौर, गगनदीप समेत कई खिलाड़ी इंटरनेशनल खेले। 1986 में फिर नामधारी से जुड़े जो सिरसा में ले गए। फिर वह इंडिया की टॉप टीम बन गई। 1992 तक काम कर फिर शाहबाद लौटा। एक एसजीएनपी स्कूल मिला और ग्राउंड बनाकर काम शुरू किया। हरियाणा की टीम अच्छी तैयार हो गई। 2000 में मुझे डिप्टी डायरेक्टर स्पोर्ट्स बनाया। हरियाणा की स्पोर्ट्स पॉलिसी बनी। तो कमेटी में मुझे रखा। 2008 में रिटायर हुआ, दो साल की की एक्सटेंशन मिली। 2009 में द्रौणाचार्य अवॉर्ड दिया। लगातार 8 साल एक्सटेंशन मिला। 1992-2004 में इंडिया हॉकी टीम पुरुष के कभी चीफ तो कभी असिस्टेंट कोच रहा। मैं कभी टीम में नहीं खेला। पंजाब में सरहिंद और अमृतसर में चार साल कोच रहा। मैने हरियाणा में ज्यादा कैरियर रहा और उसी को क्रेडिट जाता है। पंजाब को भी हरियाणा स्पोर्ट्स पॉलिसी को अपना चाहिए।” -जैसा कोच बलदेव सिंह ने भास्कर को बताया

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