डीडवाना-कुचामन जिले के छोटी खाटू का राजकीय अस्पताल इन दिनों खुद बीमार नजर आ रहा है। वर्ष 2009 में भामाशाहों के सहयोग से निर्मित इस अस्पताल की इमारत आज जर्जर अवस्था में पहुंच चुकी है और यहां स्वास्थ्य सुविधाओं का भारी अभाव है। अस्पताल की इस दयनीय स्थिति और स्टाफ की कमी को लेकर स्थानीय युवा मंडल ने अब मोर्चा खोल दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि छोटी खाटू कस्बे के चारों ओर करीब 35 से 40 गांवों का केंद्र होने के बावजूद यहां मरीजों को प्राथमिक उपचार तक नसीब नहीं हो रहा है, जिसके चलते युवाओं ने तहसीलदार के माध्यम से राजस्थान के चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर को ज्ञापन भेजकर व्यवस्था सुधारने की मांग की है।
हादसों के समय जवाब दे जाती है स्वास्थ्य व्यवस्था
छोटी खाटू नगरपालिका चेयरमैन रणवीर सिंह ने बताया कि क्षेत्र में हाल ही में हुए एक दर्दनाक सड़क हादसे ने स्थानीय प्रशासन की पोल खोल दी है। भवाद के पास बच्चों की गाड़ी पलटने की घटना के बाद जब घायलों को छोटी खाटू अस्पताल लाया गया, तो सुविधाओं के अभाव में उन्हें तुरंत रेफर करना पड़ा। प्रत्यक्षदर्शियों और ग्रामीणों का दर्द है कि आपातकालीन स्थिति में यहां एम्बुलेंस तक उपलब्ध नहीं होती, जिससे गंभीर मरीजों को डीडवाना, कुचामन या नागौर ले जाते समय रास्ते में ही जान का जोखिम बना रहता है। पहले यहां नई एम्बुलेंस की व्यवस्था थी, लेकिन वर्तमान में वह कहां और किस स्थिति में है, इसका किसी के पास कोई ठोस जवाब नहीं है।
भामाशाहों की मेहनत पर फिर रहा पानी अस्पताल के इतिहास पर नजर डालें तो भामाशाह भंवरलाल नवल ने बड़े उत्साह के साथ इस भवन का निर्माण करवाया था ताकि क्षेत्र के लोगों को इलाज के लिए दूर न भटकना पड़े। लेकिन रखरखाव के अभाव में अब अस्पताल की छतें और दीवारें डरावनी हो चुकी हैं। यहां काम करने वाले चिकित्साकर्मी भी असुरक्षित महसूस करते हैं। डॉक्टरों और अन्य सहायक कर्मचारियों के पद लंबे समय से रिक्त चल रहे हैं, जिससे अस्पताल केवल एक रेफरल सेंटर बनकर रह गया है।
युवा मंडल ने शुरू की जन-जागरूकता की मुहिम क्षेत्र के युवाओं ने ‘युवा मंडल’ के बैनर तले इस समस्या के निवारण के लिए एकजुटता दिखाई है। युवा मण्डल के अध्यक्ष हिमांशु सोनी का कहना है कि जब तक अस्पताल की दशा नहीं सुधरती और यहां एम्बुलेंस व पर्याप्त स्टाफ की नियुक्ति नहीं होती, उनका संघर्ष जारी रहेगा। गांव के बुजुर्गों और प्रबुद्ध नागरिकों ने भी युवाओं की इस पहल की सराहना की है। ग्रामीणों का मानना है कि यदि समय रहते सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया, तो यह जन-आक्रोश बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है। फिलहाल, क्षेत्र की जनता की निगाहें सरकार और प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं।


