ड्रिप सिंचाई और मलचिंग से बढ़ी पैदावार:चने का दाना सिकुड़ता नहीं, पानी की भी बचत

चीलाचौन गांव के किसान दीपक गौर ने चने की खेती में पानी बचत की नई तकनीक स्थापित की। ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग से चने की पैदावार डेढ़ गुना बढ़ी। दीपक ने चने की खेती के लिए ड्रिप सिंचाई का उपयोग किया है। यह उदाहरण न केवल प्रदेश के लिए बल्कि देश के लिए भी महत्वपूर्ण है। जिले में इस बार करीब 60 हजार हेक्टेयर में चने की खेती की जा रही है। दीपक ने चने की खेती में टपक सिंचाई की एक ऐसी मिसाल कायम कर दी है जो अब जिले में किसानों के साथ-साथ विशेषज्ञों के लिए भी उदाहरण है। इस प्रणाली को काबुली चना में प्रमुख रूप से इस्तेमाल किया गया। किसान दीपक गौर ने स्वयं पानी की बचत करने की सोची। खेती को कम पानी में लाभकारी बनाने की तकनीक: जितना पानी मानसून सत्र में बरसता है उससे ज्यादा पानी हम धरती की गहराई से निकाल रहे हैं। ऐसे में बरसों पहले जो पानी धरती की गहराई में पहुंचा था वह पानी हम उपयोग कर रहे हैं। एक तरह से हम भंडारण खत्म कर रहे हैं। ऐसे में किसानों को भी इस बात का एहसास था कि उनके पास जो पानी है उसका यदि तेजी से दोहन किया गया तो एक या दो बार पानी दे पाना भी संभव नहीं हो पाएगा। इस तरह से इस संकट को किसानों ने भांपा और खेती को कम पानी में भी लाभकारी बनाने के लिए आगे आए। 40 से 50 प्रतिशत पानी की बचत: किसान दीपक गौर ने बताया पहली बार चने की खेती ड्रिप सिंचाई से करने की कवायद की। इसमें बेड मल्चिंग पद्धति को अपनाया गया। इसे स्थानीय स्तर पर मेड़ मल्चिंग प्रणाली भी कहा जाता है। इससे करीब 40 से 50 प्रतिशत पानी कम लगता है। 40 प्रतिशत बीज भी कम लगता है। इससे किसानों को पानी के साथ बीज के मामले में भी बचत होती है। इस पद्धति से चने की पैदावार डेढ़ गुना उत्पादन ज्यादा होता है। वहीं अनावश्यक खाद और कीटनाशक के उपयोग से भी बचा जा सकता है। चने का दाना सिकुड़ता नहीं: किसान दीपक गौर ने बताया कि इस व्यवस्था से पानी दिए जाने के कारण चने का दाना सिकुड़ता नहीं है। इस कारण से किसानों को मंडी में उसका मूल्य भी बेहतर मिलता है। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए बताया कि मंडी में यदि अच्छे दाने वाला चना पहुंचता है तो उसके औसत रूप से 200 रुपए क्विंटल तक अधिक मिलते है। वहीं चने की बीमारियां भी कम लगती हैं। जिले में तीन क्लाइमेट जोन: उल्लेखनीय है कि नर्मदापुरम जिला पूरे देश के लिए एक विविधता भरा क्षेत्र है। इसकी वजह यह है कि यहां पर तीन अलग-अलग तरह के क्लाइमेटिक जोन है। इसमें मुख्य रूप से चने की खेती में ड्रिप सिंचाई और बेड मल्चिंग पद्धति से चना लगाने के साथ ही किसान ने ड्रिप सिंचाई से पैदावार की है। विषम हालात में भी इसका उपयोग किया है। यह पद्धति और इस तरह की तरकीब की जानकारी आने वाले समय में और भी किसानों तक पहुंचती है तो निश्चित रूप से खेती को लाभकारी धंधा और उत्पादन में बढ़ोत्तरी के लिए एक मील का पत्थर साबित किया जा सकता है।

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