तीन केस, दो जांच एजेंसी…एक सवाल- कब मिलेगा इंसाफ:गुना की गीता आठ साल से गायब, आत्माराम मर्डर केस भी सॉल्व नहीं

राज्य और CBI की पूरी ताकत होने के बावजूद दो फरार पुलिस अफसरों को पकड़ा नहीं जा सका, यह अदालत की अवमानना के समान है। आप लिखित में दें कि उनका पता लगाने में असमर्थ हैं। ये टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने की है। कोर्ट ने देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी CBI और मध्यप्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। दरअसल, 26 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में गुना के देवा पारदी की मौत के मामले की सुनवाई हुई। सीबीआई उन दो पुलिस अफसरों को कोर्ट के सामने पेश नहीं कर सकी, जिन पर देवा पारदी की पुलिस कस्टडी में हत्या के आरोप है। सुप्रीम कोर्ट ने CBI को आखिरी मौका देते हुए 8 अक्टूबर तक की मोहलत दी है। ये भी कहा कि यदि अफसर नहीं पकड़े जाते हैं, तो राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव और सीबीआई के जांच अधिकारी को खुद कोर्ट में उपस्थित रहना होगा। गुना का ये कोई पहला मामला नहीं है, जिसमें पुलिस, सीआईडी और सीबीआई जैसी प्रतिष्ठित जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हों। ऐसे दो और मामले हैं, जिन्हें सुलझाने में सीबीआई और सीआईडी भी नाकाम रही है। इन मामलों में भी आरोप पुलिस अफसरों पर ही है। केस के पीड़ित बरसों से इंसाफ का इंतजार कर रहे हैं। आखिर कौन से है वो मामले…पढ़िए, रिपोर्ट अब सिलसिलेवार जानिए, इन तीनों केस के बारे में केस1: 9 महीने से मामला सीबीआई के पास, मगर गीता नहीं मिली
गीता पिछले 8 साल से लापता है। उसे ढूंढने के लिए चार एसआईटी का गठन हो चुका है, लेकिन वह जिंदा है या नहीं, ये किसी को नहीं पता। पिछले साल दिसंबर में हाईकोर्ट ने इस केस को सीबीआई के सुपुर्द किया था। अब नौ महीने बीत चुके हैं, गीता का अभी भी कोई सुराग नहीं है। गीता के पिता गजेंद्र चंदेल का बेटी के वापस लौटने का इंतजार लंबा होता जा रहा है। दरअसल, 1 अगस्त 2017 की सुबह 11 बजे गीता राशन की दुकान से मिट्टी का तेल लेने गई थी। जब घंटों तक वह वापस नहीं आई, तो पिता गजेंद्र की चिंता बढ़ी। वे उसे देखने गए तो दुकान बंद थी और आसपास किसी को कुछ पता नहीं था। पिता ने पूरा गांव छान मारा लेकिन बेटी का कोई सुराग नहीं मिला। जब वे उम्मीद लेकर थाने पहुंचे, तो पुलिस ने भगा दिया। तीन एसआईटी ने जांच की, नतीजा सिफर
नाबालिग गीता के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज करने में पुलिस ने 10 दिन लगा दिए। 3 अगस्त को आवेदन लिया गया और 9 अगस्त को FIR लिखी गई। इस शुरुआती देरी ने ही मामले की दिशा तय कर दी थी। पुलिस ने लड़की को खोजने के बजाय केवल खानापूर्ति की। दो संदिग्धों को पकड़ा भी, लेकिन सबूतों के अभाव में छोड़ दिया। जांच के दौरान एक संदिग्ध ने यह तक कबूल किया कि उसने नाबालिग से बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर शव तालाब में फेंक दिया था, लेकिन पुलिस इस लीड पर भी कोई ठोस सबूत नहीं जुटा सकी। मामले की गंभीरता को देखते हुए तीन विशेष जांच दल (SIT) बनाए गए, लेकिन नतीजा शून्य रहा। पिता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया
जब पुलिस से भरोसा उठा, तो पिता ने न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर की। यहीं से पुलिस की जवाबदेही तय होनी शुरू हुई। हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने मामले में ऐसी सख्ती दिखाई कि थाना प्रभारी से लेकर तत्कालीन ASP, SP और IG तक को अदालत के सामने हाजिर होना पड़ा। कोर्ट की फटकार के बाद अगस्त 2023 में पुलिस को एक हलफनामा देकर भविष्य में ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए ‘रोड मैप’ प्रस्तुत करना पड़ा। कोर्ट के आदेश पर 300 पुलिसकर्मियों को ग्वालियर में संवेदनशील मामलों की जांच के लिए विशेष ट्रेनिंग भी दी गई। हाईकोर्ट ने कहा- एमपी पुलिस अकुशल और गैरजिम्मेदार
जब अदालत को पुलिस का रवैया गैरजिम्मेदार नजर आया तो दिसंबर 2024 में हाईकोर्ट ने ये मामला सीबीआई को सौंप दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में पुलिस के रवैये पर सख्त टिप्पणी भी की। कोर्ट ने कहा- इस केस के इन्वेस्टिगेशन में एमपी पुलिस का रवैया बेहद अन प्रोफेशनल रहा है। पिछले सात साल में कोर्ट ने कई बार ऑर्डर दिए, मगर पुलिस ने अपनी गैरजिम्मेदार वर्किंग स्टाइल में कोई बदलाव नहीं किया। यदि नाबालिग मप्र में सुरक्षित नहीं है और पुलिस उसे ढूंढ नहीं पा रही है तो सीबीआई को केस ट्रांसफर करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। इसके साथ ही कोर्ट ने ये भी कहा कि पुलिस केवल कागजी कार्रवाई कर कीमती समय बर्बाद करती रही। पुलिस को आज तक ये तक पता नहीं चला कि बच्ची जिंदा है या नहीं? सीबीआई को केस सौंपे 9 महीने बीत चुके हैं। गीता के पिता गजेंद्र चंदेल आज भी बेटी के लौटने का इंतजार कर रहे हैं। वो वापस आएगी या नहीं, देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी ने अभी तक ऐसा कोई ठोस जवाब नहीं दिया है। केस2: 10 साल से सस्पेंस- आत्माराम पारदी जिंदा है या नहीं
यह वो मामला है, जिसमें पुलिस पर बर्बरता के आरोप लगे और बाद में पुलिस ने उसे दबाने की कोशिश की। 9 जून 2015 को आत्माराम पारदी अपने परिवार के साथ पार्वती नदी में एक रिश्तेदार की अस्थियां विसर्जित करने गया था। उस पर चोरी का सिर्फ एक मामला दर्ज था, जिसमें वह जमानत पर बाहर था। परिवार के अनुसार, जब वे नदी में थे, तभी धरनावदा के तत्कालीन थाना प्रभारी रामवीर सिंह कुशवाह अपनी निजी गाड़ी से कुछ पुलिसकर्मियों और मुखबिरों के साथ वहां पहुंचे। वे गुरुग्राम में हुई एक चोरी के मामले में आत्माराम को संदिग्ध मान रहे थे। पुलिस को देखते ही आत्माराम नदी में कूद गया। परिजन का आरोप है कि उसे गोली मारी गई थी। घटना के दो साल बाद गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज
इसके बाद दो लोग नदी में कूदे और उसे घायल अवस्था में पकड़कर गाड़ी में डालकर ले गए। पुलिस ने कहा कि उसे अस्पताल ले जा रहे हैं, लेकिन आत्माराम फिर कभी नहीं लौटा। यहीं से उसकी मां अप्पी बाई का न्याय के लिए वह संघर्ष शुरू हुआ, जो उनकी मौत के साथ ही खत्म हुआ। डेढ़ साल तक पुलिस परिवार को गुमराह करती रही। 2016 में थाना प्रभारी ने अप्पी बाई से कहा था कि आत्माराम की मौत हो चुकी है और वह परिवार का खर्च उठाने को तैयार है, लेकिन मां ने पैसे की जगह न्याय मांगा। जनवरी 2017 में अप्पी बाई ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की। कोर्ट के नोटिस के बाद ही पुलिस ने 3 मार्च 2017 को यानी घटना के लगभग दो साल बाद, आत्माराम की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज की। हाईकोर्ट ने सीआईडी को फटकार लगाई, स्टेटस रिपोर्ट मांगी
अगस्त 2019 में मामले की जांच CID को सौंप दी गई, लेकिन यहां भी कुछ नहीं बदला। 2022 तक CID टीम में 10 से ज्यादा बार बदलाव हुए, लेकिन जांच जस की तस रही। इसी बीच, 2020 में न्याय का इंतजार करते-करते अप्पी बाई की भी मौत हो गई। दिसंबर 2022 में हाईकोर्ट ने एक बार फिर CID को फटकार लगाते हुए स्टेटस रिपोर्ट मांगी। कोर्ट की तल्खी के बाद CID हरकत में आई और आखिरकार 7 साल बाद यह माना कि आत्माराम की मौत हो चुकी है। आरोपी SI रामवीर कुशवाह और अन्य के खिलाफ हत्या (IPC 302) और सबूत मिटाने (IPC 201) की धाराएं जोड़ी गईं। रामवीर को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया, लेकिन CID उसे दो साल तक पकड़ नहीं पाई। कहानी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब फरार चल रहे मुख्य आरोपी रामवीर कुशवाह ने हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत हासिल कर ली। 26 सितंबर 2025 को जमानत देते हुए कोर्ट ने एक बार फिर जांच एजेंसी को आइना दिखाया। कोर्ट ने कहा, 8 साल पहले अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। 5 वर्ष बाद अपीलकर्ता (रामवीर) के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई, लेकिन 8 साल बीतने के बाद भी जांच जारी है और कोई आरोपपत्र दाखिल नहीं किया गया है। आत्माराम का शव कभी बरामद नहीं हुआ और उसकी मृत्यु के संबंध में कोई निर्णायक रिपोर्ट रिकॉर्ड में नहीं है। ​​तीसरा केस: हिरासत में मौत और सुप्रीम कोर्ट का गुस्सा
14 जुलाई 2024 को 25 साल के देवा पारदी की बारात निकलने वाली थी। शाम 4:30 बजे जिस ट्रैक्टर से बारात जानी थी, उसी पर बैठाकर म्याना थाने की पुलिस देवा और उसके चाचा को ले गई। कारण बताया गया- चोरी के मामले में बरामदगी करनी है। उसी शाम परिवार को जिला अस्पताल से खबर मिली कि एक पारदी युवक का शव पोस्टमॉर्टम के लिए लाया गया है। वह शव देवा का था। उसकी पुलिस हिरासत में मौत हो चुकी थी। इस खबर ने पारदी समुदाय को झकझोर दिया। अस्पताल में देवा की होने वाली दुल्हन और चाची ने आत्मदाह का प्रयास किया। महिलाओं ने आरोप लगाया कि थाने में देवा को पीट-पीटकर मार डाला गया। विरोध में उन्होंने कलेक्ट्रेट पर अर्धनग्न प्रदर्शन भी किया। आरोपी टीआई और एसआई फरार हो गए थे
मामले में मजिस्ट्रियल जांच के आदेश हुए, जिसमें यह निष्कर्ष निकला कि देवा की मौत ‘पुलिस हिरासत के दौरान मारपीट और प्रताड़ना के कारण संदिग्ध और असामान्य परिस्थितियों में हुई।’ इस रिपोर्ट के आधार पर 5 सितंबर को म्याना थाने के पुलिसकर्मियों के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज हुआ। आरोपी बनाए गए तत्कालीन TI संजीत मावई और SI उत्तम सिंह फरार हो गए। जब राज्य पुलिस अपने ही कर्मचारियों को पकड़ने में नाकाम रही, तो देवा की मां हंसुरा बाई ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। 15 मई को सुप्रीम कोर्ट ने CBI को एक महीने के भीतर आरोपियों को गिरफ्तार करने का निर्देश दिया। लेकिन CBI भी उन्हें नहीं पकड़ सकी। सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई और दूसरे दिन एसआई का सरेंडर
इसके बाद हंसुरा बाई ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर की। इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए 26 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट का गुस्सा फूटा और उसने CBI और राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट की सख्ती का असर तुरंत दिखा। अगले ही दिन, 27 सितंबर को फरार SI उत्तम सिंह ने इंदौर में सरेंडर कर दिया, जहां CBI ने उसे गिरफ्तार कर लिया। हालांकि, मुख्य आरोपी TI संजीत मावई अब भी फरार है। ये खबर भी पढ़ें… ‘मिस्टर इंडिया’ पुलिसकर्मी… 1 दिन में गिरफ्तार गुना जिले में पुलिस कस्टडी में हुई देवा पारदी की मौत के मामले में फरार SI उत्तम सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया है। हालांकि, पहले ये खबर आई थी कि SI ने शुक्रवार को CBI के सामने सरेंडर किया है। जानकारी के मुताबिक, SI उत्तम सिंह ने शुक्रवार को कोर्ट में सरेंडर का आवेदन दिया था। जैसे ही उत्तम सिंह कोर्ट परिसर में पहुंचे, वहां से CBI ने उन्हें अरेस्ट किया और अपने दफ्तर ले गई। पढ़ें पूरी खबर…

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