मध्यप्रदेश के कई शहरों में दलित दूल्हे की बारात पुलिस पहरे में निकलने की खबरें तो आपने बहुत सुनी-पढ़ी होगी, लेकिन दमोह जिले के पटेरा तहसील के कुआंखेड़ा गांव में 75 साल में पहली बार दलित समाज के किसी दूल्हे की बारात घोड़ी पर धूमधाम से निकली। बंसल समाज का दूल्हा नंदू बंसल घोड़ी पर सवार होकर गांव की सड़कों पर निकला, तो उसके हाथ में केवल लगाम नहीं थी, बल्कि भारत का संविधान था। ढोल-नगाड़ों की गूंज, रिश्तेदारों के थिरकते कदम दिखे। इस दौरान समाज ने कहा कि यह सिर्फ रछवाई (बारात की निकासी) शादी की खुशी नहीं है, बल्कि आत्मसम्मान का उत्सव है। समाज ने बिना विवाद के रछवाई निकलने पर पुलिस प्रशासन को धन्यवाद कहा। बारात से जुड़ी ये 3 तस्वीरें देखिए… गांव में परिवार को विवाद का डर था, पुलिस से मांगी थी मदद दरअसल, एक दिन पहले बुधवार को बंसल समाज और एससी महासभा ने एसपी श्रुत कीर्ति सोमवंशी को एक आवेदन दिया था। इसमें उन्होंने आशंका जताई थी कि गुरुवार को घोड़े पर रछवाई निकालने के दौरान गांव के कुछ दबंग विवाद कर सकते हैं, इसलिए उन्हें सुरक्षा दी जाए। इस आवेदन के बाद एसपी ने हटा थाना पुलिस को शांति व्यवस्था बनाए रखने के निर्देश दिए। बुधवार रात पटेरा तहसीलदार उमेश तिवारी और हटा थाने का पुलिस बल गांव पहुंचा। उन्होंने बंसल परिवार के सदस्यों और गांव के अन्य लोगों से बातचीत की। बंसल समाज के किसी दूल्हे ने नहीं चढ़ी थी घोड़ी दूल्हे के चाचा नन्ना बंसल ने बताया कि हमारे गांव में बंसल समाज के किसी दूल्हे ने घोड़ी नहीं चढ़ी थी। परिवार चाहता था कि रछवाई रस्म को धूमधाम से मनाएंगे, लेकिन विवाद की आशंका थी। कानून का सहारा लेना पड़ा। एससी महासभा के अध्यक्ष आकाश भारती ने बताया कि एसपी श्रुत कीर्ति सोमवंशी ने मदद की। पुलिस की मौजूदगी में रछवाई निकली। पुलिस और प्रशासन ने पूरा सहयोग किया है। दूल्हे के भाई जीवन बंसल ने कहा कि गांव में सभी लोग इसी प्रकार भाईचारे के साथ रहें। आपसी सहमति से कार्यक्रम संपन्न हो गया- तहसीलदार वहीं तहसीलदार उमेश तिवारी ने बताया कि बंसल समाज के लोगों ने सुरक्षा की मांग की थी। पुलिस और प्रशासन की टीम गांव पहुंची। गांव के लोगों ने स्पष्ट किया कि उन्हें बंसल समाज के दूल्हे की घोड़े पर रछवाई निकालने से कोई आपत्ति नहीं है। वे पूरा सहयोग करेंगे। कार्यक्रम संपन्न हो गया है। 75 साल तक घोड़ी पर क्यों नहीं चढ़ पाया था दूल्हा? बंसल समाज के लोगों के मुताबिक, यह सिर्फ एक परंपरा नहीं थी, बल्कि डर से पैदा हुई मजबूरी थी। आसपास के इलाकों में दलित समाज की बारातों को लेकर हुए विवाद, झगड़े और तनाव की खबरें वर्षों तक गांव में गूंजती रहीं। यही वजह थी कि हर पीढ़ी ने अपने बेटों को समझाया कि घोड़ी पर मत बैठना, कहीं माहौल न बिगड़ जाए। कहीं दूसरे समाज के लोगों को आपत्ति न हो जाए। इसी डर ने 75 साल तक समाज के आत्मसम्मान को दबाए रखा। बंसल समाज की बारातें पैदल ही निकलती रहीं। ………………………… ये खबरें भी पढ़ें 1. दलित दुल्हन की बिंदोली रोकी…पुलिस ने पूरी कराई:रतलाम में राजपूत परिवार ने रोका था; 5 लोगों पर केस दर्ज रतलाम के लकमाखेड़ी गांव में दलित परिवार की बेटी की बिंदोली जैसे ही राजपूत समाज के घरों के सामने पहुंची, समाज के लोगों ने उन्हें रोक दिया। वे बिंदोली के आगे आकर खड़े हो गए और कहने लगे- तुम्हारी बिंदोली गांव में नहीं निकलेगी। पढ़ें पूरी खबर… 2. MP में दबंगों ने नहीं निकलने दी दलित की बारात: गांव में घुसने से रोका, टेंट उखाड़ा; पत्थरबाजी के बाद पुलिस ने आंसू गैस दागी जिस गांव में कुछ महीने पहले सीएम शिवराज सिंह चौहान ने दलित महिला के हाथों बेर खाए थे, उसी गांव में दलितों पर रविवार रात दबंगों का कहर देखने को मिला। यहां धूमधाम से बेटी की शादी करना एक दलित परिवार को महंगा पड़ गया। इन्होंने लड़की की शादी में इतना कहर ढाया कि टेंट उखाड़ दिए, बिजली काट दी और गांव में बारात नहीं घुसने दी। पुलिस पहुंची तो उस पर भी पथराव कर दिया। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले दागने पड़े। पढ़ें पूरी खबर…


