सिटी रिपोर्टर| बिलासपुर छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और परंपरा का प्रतीक दान और त्याग का लोकपर्व छेरछेरा शनिवार को पूरे उत्साह, आस्था और उमंग के साथ मनाया गया। सुबह होते ही शहर के गली-मोहल्लों में बच्चों और युवाओं की टोलियां निकल पड़ीं और पारंपरिक बाल मनुहार “अरन-बरन कोदो दरन, जभे देबे तभे टरन…छेरछेरा, माई कोठी के धान ले हेरते हेरा…” की गूंज हर ओर सुनाई दी। छेरछेरा के अवसर पर बच्चों में खासा उत्साह देखने को मिला। टोलियां घर-घर जाकर अन्न-धन की मांग करती रहीं, वहीं लोगों ने भी लोक परंपरा का पालन करते हुए खुले हाथों से दान दिया। परंपरा के अनुसार पहले जहां धान का दान किया जाता था, वहीं शहरी इलाकों में अब रुपए-पैसे, चावल-दाल के साथ-साथ चॉकलेट, बिस्किट और खाने-पीने की अन्य सामग्री देकर छेरछेरा मनाया गया। छेरछेरा का उल्लास सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शहर के पॉश कॉलोनियों और रिहायशी इलाकों में भी इसका रंग चढ़ा रहा। कई घरों के बाहर लोगों ने पहले से ही टोकरी और बोरियों में धान व अन्य सामग्री रखकर बच्चों का इंतजार किया। जितनी भी टोलियां पहुंचीं, सभी को श्रद्धा और खुशी के साथ दान दिया गया। शहर के बंधवापारा, इमलीभाठा, चांटीडीह, लिंगियाडीह, चिंगराजपारा, जरहाभाठा, मुरूम खदान, खमतराई, बहतराई, मंगला, उसलापुर, तिफरा सहित अन्य क्षेत्रों में बच्चों को छेरछेरा मांगते देखा गया। हर इलाके में लोकगीतों और बच्चों की पुकार से माहौल जीवंत बना रहा। छेरछेरा पर्व की पौराणिक कथा: व्यंकटेश मंदिर के महंत डॉ. कौशलेंद्र प्रपन्नाचार्य ने बताया कि पार्वती से विवाह पूर्व भोलेनाथ ने कई किस्म की परीक्षाएं ली थीं। उनमें एक परीक्षा थी कि वे नट बनकर नाचते-गाते पार्वती के निवास पर भिक्षा मांगने गए थे और शिव निंदा करने लगे थे, ताकि पार्वती उनसे विवाह करने के लिए मना कर दें। छत्तीसगढ़ में छेरछेरा का पर्व मनाया जाता है। उसमें भी लोग नट बनकर नाचते-गाते हुए भिक्षा मांगने के लिए जाते हैं। लायंस क्लब बिलासपुर सेवा ने छेरछेरा पर सेवा कार्य किया। भावी सदस्य आशीष अग्रवाल के सहयोग से जिला अस्पताल, नया बस स्टैंड, पुराना बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन में जरूरतमंद लोगों को कंबल वितरित किया गया। इस सेवा कार्य में अध्यक्ष संतोष पांडे, आशीष अग्रवाल, निशेष वर्मा, गोपाल अग्रवाल, कमलेश वर्णवाल, विजय वर्णवाल, राजन पांडे ,शुभम मिश्रा आदि मौजूद रहे।


