भास्कर न्यूज | अमृतसर दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की ओर से विलक्षण योग एवं ध्यान शिविर’ का आयोजन किया गया। इसमें संस्थान की ओर से स्वामी अश्विनी ने भारतीय संस्कृति की उत्कृष्ट विरासत ‘योग’ की महानता से परिचित करवाते हुए योग साधकों के बारे बताया। उन्होंने कहा कि योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है। यह तन, मन और आत्मा की एकात्म अवस्था का परिचायक है। मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है, संयम और पूर्ति प्रदायक तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को भी प्रदान करने वाला है। यह मात्र व्यायाम के बारे में ही नहीं है, बल्कि अपने भीतर एकता की भावना, दुनिया और प्रकृति की खोज के विषय में है। हमारी परिवर्तन शील जीवन- शैली में यह चेतना बनकर हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकता है। इसीलिए गौरवान्वित होकर यह कहा जा सकता है कि सम्पूर्ण विश्व में आर्यावर्त भारतीय योग मनीषियों द्वारा प्रदत्त “योग पद्धति’ को उत्कृष्ट निधि के रूप में सर्वसम्मति से समग्र राष्ट्रों द्वारा स्वीकार किया है। “योग’ की रहस्यात्मक विवेचना पर प्रकाश डालते स्वामी जी ने बताया कि आज मूलत कुछ योगासनों और प्राणायामों को ही सम्पूर्ण योग पद्धति स्वीकार कर लिया जाता है। जब कि ऐसा नहीं है “योग’ शब्द संस्कृत की “युज’ धातु से बना है। जिसका अर्थ होता है “जुड़ना’। अर्थात हमारे तन, मन और आत्मा की एकात्म अवस्था ही योग है।


