भास्कर न्यूज | जालंधर दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान नूरमहल आश्रम में सत्संग और कार्यक्रम किया गया। इस अवसर पर संगत ने अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ दिव्य सरोवर में स्नान किया। संगत ने शब्द-कीर्तन का आनंद लिया, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत हो गया। स्वामी चिन्मयानंद ने माघ स्नान, संगत और साधु-संतों की धूलि के गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य को सरल शब्दों में समझाया। सत्संग के दौरान उन्होंने गुरुबाणी की पंक्तियों के जरिए गहन आध्यात्मिक सत्य को उजागर किया गया । उन्होंने कहा कि जीवन में सबसे पहले आत्मा का स्नान आवश्यक है। यह आत्मिक स्नान केवल बाहरी सरोवर में जल-स्नान से संभव नहीं होता। जब पूर्ण गुरु के द्वारा ब्रह्म ज्ञान की दीक्षा दी जाती है, तभी जीवात्मा अमृतरूपी आंतरिक सरोवर में स्नान करती है और उसी क्षण उसका जीवन सफल होता है। उन्होंने बताया कि जब जीवात्मा उस बाहरी सरोवर में स्नान करती है, जिसकी नींव स्वयं ब्रह्मज्ञानी द्वारा रखी गई हो, तो वह ‘सोने पर सुहागा’ सिद्ध होता है। इस प्रकार आंतरिक आत्मिक शुद्धि और बाह्य धार्मिक कर्म दोनों का समन्वय ही मानव जीवन को पूर्णता प्रदान करता है। कार्यक्रम के अंत में संगत ने गुरु-कृपा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की और मकर संक्रांति के इस पावन आयोजन को आत्मिक जागरण एवं आध्यात्मिक उन्नति का सशक्त माध्यम बताया।


