उदयपुर के टीबी (क्षय रोग) विभाग को भी संभवत: धांधली का टीबी हो गया है। आठ माह पहले तत्कालीन जिला टीबी अधिकारी (डीटीओ) डॉ. अंशुल मट्ठा घूस लेते पकड़े गए थे। अब सराड़ा ब्लॉक की सेमारी सीएचसी में संविदा पर तैनात डाटा एंट्री ऑपरेटर भगवान पटेल (26) और लैब टेक्नीशियन रितिक मेघवाल (24) की ओर से बड़ा घोटाला सामने आया है। दोनों ने मिलकर 81 फर्जी मरीज तैयार किए। इसके बाद केंद्र सरकार की निक्षय पोषण योजना (एनपीवाई) के तहत इनका इलाज शुरू किया। योजना का भुगतान लेने के लिए मरीजों की बैंक डिटेल में खुद, अपनी मां, पिता और पड़ोसन की जानकारी दी। इसके बाद 8 लाख की दवाएं और करीब 45 हजार रुपए का भुगतान ले लिया। भगवान ने पैसा लेने के लिए एसबीआई बैंक के अपने खाते का 16, इंडियन बैंक के खाते का 17, मां कंकू बाई के एसबीआई खाते का 12, पिता भीम पटेल के इसी बैंक के खाते का 16 और पड़ोसी भावना लोहार के भी इसी बैंक के खाते का 20 मरीजों के लिए इस्तेमाल किया। अपने और परिवार के खातों का 61 बार इस्तेमाल किया। इनमें 26 फर्जी मरीजों के 45 हजार रुपए तो खातों में आ गए, लेकिन बाकी की डिटेल में आईएफएससी कोड गलत होने से राशि अटक गई। खास बात यह भी है कि इन्होंने किसी मरीज के नाम में तो किसी के एड्रेस में अंग्रेजी अल्फाबेट यानी fhsb जैसे मनमर्जी के शब्द लिखे। भास्कर ने 81 मरीजों के नंबरों पर कॉल किए तो कुछ ने कॉल पिक नहीं किया, बाकी ज्यादातर इन वेलिड मिले। एक-दो नंबर तो दूसरे राज्यों के थे। उन्हें पता ही नहीं है कि उन्हें कभी टीबी हुई और इलाज चल रहा है। सेमारी यूं तो सलूंबर जिले में आता है, लेकिन उदयपुर के टीबी विभाग के अधीन है। गड़बड़ी ऐसे…रोगी मीणा, खाता पटेल का, मोबाइल नंबर दूसरे राज्यों के केस 1- रूपा एमएम (mm) नाम के मरीज का 4 जनवरी 2024 से ट्रीटमेंट शुरू करना दिखाया। अकाउंट में भावना लोहार के एसबीआई बैंक अकाउंट नंबर 61243840325 चढ़ाए। इसमें आईएफएससी कोड ICIC0004040 आईसीआईसी बैंक का डाला। एड्रेस में duecb लिखा हुआ है। इसके आगे लिखे मोबाइल नंबर पर संपर्क किया गया, लेकिन कई प्रयासों के बावजूद किसी ने भी फोन नहीं उठाया। केस 2- राधा मीणा को मरीज बताया गया। इसका इलाज 12 फरवरी 2024 से शुरू होना बताया। इसके बैंक अकाउंट में कर्मचारी भगवान पटेल ने अपनी मां कंकू देवी का एसबीआई खाता नंबर 61244877682 डाला। आईएफएससी कोड SBIN0031224 एसबीआई बैंक का डाल दिया। खाते में 1500 रु. की किस्त जमा भी हो गई। एड्रेस में जोधपुरिया लिखा। मोबाइल नंबर पर कॉल किया तो वह प्रदेश के बाहर का व्यक्ति निकला। तत्कालीन डीटीओ घूस मामले में पहले ही निलंबित चल रहे
मामले में सीनियर ट्रीटमेंट सुपरवाइजर (एसटीएस) मांगीलाल लवाना (50) और तत्कालीन जिला टीबी अधिकारी (डीटीओ) डॉ. अंशुल मट्ठा भी आरोपों के घेरे में हैं। डॉ. मट्ठा को मई 2024 में एसीबी ने रिश्वत लेते गिरफ्तार किया। कुछ दिन जेल में रहे और अभी निलंबित हैं। आरोपी लैब टेक्नीशियन रितिक मेघवाल ने पूछताछ के दौरान लिखित में दिया है कि उसने इस मामले को दबाने के लिए एसटीएस मांगीलाल को 13 हजार रुपए कैश दिए। मांगीलाल ने पूछताछ के दौरान लिखित में कहा कि उन पर डीटीओ डॉ. मट्ठा के ऑफिस से जल्दबाजी में पेंडेंसी क्लियर करने का दबाव था। इस कारण अकाउंट डिटेल्स चेक नहीं की और इसे आगे पास कर दिया। कार्मिकों ने फर्जीवाड़ा स्वीकार करते हुए माफीनामा भी विभाग को सौंपा है। बता दें कि मामला पिछले साल के सितंबर से इस साल के मार्च के बीच का है। उस समय डॉ. मट्ठा डीटीओ थे। मरीज ही नहीं तो उनकी दवाएं कहां गईं?
केंद्र सरकार की निक्षय पोषण योजना के तहत टीबी के मरीजों को फ्री इलाज व दवाइयां के अलावा पोषण के लिए 3 हजार रु. दिए जाते हैं। रोग की पुष्टि होते ही निक्षय आईडी बनाई जाती है। इसके बाद 5 किस्तों में पैसा जमा होता है। पहली किस्त में 1 हजार रु. मिलते हैं। इसके बाद 4 माह तक 500-500 रु. मिलते हैं। हालांकि बीते माह 1 नवंबर से यह राशि बढ़कर 6 हजार कर दी गई है। बड़ा सवाल यह है कि सभी 81 मरीजों के लिए डीटीओ ऑफिस से फ्री दवाइयां इश्यू हो चुकी हैं। एक रोगी की दवा लगभग 10 हजार रु. की होती है। जब मरीज ही फर्जी हैं तो दवाइयां कहां गई? इनकी कालाबाजारी की आशंका है। मामले में एसटीएस व पूर्व डीटीओ पर संदेह इसलिए
रोगी की आईडी बनने के बाद 5 किस्तों में पैसा मिलता है। औपचारिकताएं पूरी होने के बाद भुगतान के लिए एसटीएस मांगीलाल के पास दस्तावेज आए। उन्होंने पास कर दिया। अंत में यह तत्कालीन डीटीओ मट्ठा के पास पहुंचे, बिना जांचे पास किया। बड़ा फर्जीवाड़ा खुलना संभव
खुलासे के बाद विभाग ने आगे के पेमेंट रोक दिए हैं। रिकॉर्ड की जांच में फर्जीवाड़ा बढ़ सकता है। फर्जीवाड़ा में खाता नंबर तो सही रखे, लेकिन कुछ में आईएफएससी गलत डाला। इस कारण 26 खातों में पैसा आया। चार खातों में तो पूरे 3 हजार रु. आ गए, 22 अकाउंट में 1500-1500 रु. आए। आरोपी बोले- हमने पैसा ऊपरी अफसरों को दिया, ऊपरी बोले-आरोप गलत डीटीओ ने कहा- उच्चाधिकारियों को बताया है
टीबी अधिकारी डॉ. आशुतोष सिंघल ने बताया कि दिसंबर के पहले सप्ताह में जिला स्तरीय मीटिंग में गड़बड़ी की आशंका होने पर जांच की गई। सीएमएचओ सलूंबर व बीसीएमओ सराड़ा को जांच को कहा है। राज्य क्षय रोग अधिकारी व सीएमएचओ उदयपुर को भी सूचना दी है। भगवान ने कहा- लैब टेक्नीशियन ने कहा था-पैसे दूंगा
“लैब टेक्नीशियन रितिक ने मुझसे बैंक खातों की डिटेल्स मांगी थी। उसने कहा था कि मैं इसके बदले में पैसा दूंगा। तब मैंने 5 लोगों की डिटेल्स दे दी।”
-भगवान पटेल, डाटा एंट्री ऑपरेटर टेक्नीशियन बोला-मुझे कुछ पता नहीं
“ऐसा कुछ नहीं है। मैंने कुछ नहीं किया। मुझे मामले के बारे में कोई जानकारी नहीं है।”
-रितिक मेघवाल, लैब टेक्नीशियन मांगीलाल ने कहा- मैंने किसी से पैसे नहीं लिए
“पेंडेंसी खत्म करने का प्रेशर था। जल्दबाजी में बिना जांचे बैंक डिटेल्स अप्रूव कर दी। मैंने घूस नहीं ली।”
-मांगीलाल लवाना, एसटीएस, सेमारी मट्ठा ने कहा- मेरा काम सिर्फ पेमेंट अप्रूवल का
“मेरा काम पेमेंट अप्रूव करने का था। बैंक डिटेल्स एसटीएस चेक करता है। बैंक अकाउंट डिटेल नहीं दिखती।” -डॉ. अंशुल मट्ठा, तत्कालीन डीटीओ राज्य टीबी अधिकारी ने साधी चुप्पी
उदयपुर जिला टीबी विभाग में हो लगातार हो रही गड़बड़ी को लेकर जब राज्य टीबी अधिकारी, जयपुर डॉ. पुरुषोत्तम सोनी से बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने चुप्पी साध ली। सवाल का जवाब नहीं दिया। ऐसे में उच्च अधिकारियों की चुप्पी उन्हें भी शक के घेरे में डालती है। सीएमएचओ ने कहा- निष्पक्ष जांच कराएंगे
“मेरे संज्ञान में मामला आया है। मैं इस मामले को दिखवाता हूं। निष्पक्ष जांच की जाएगी और अगर ऐसा है तो दोषियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होगी।” – डॉ. संपत मीणा, सीएमएचओ, सलूंबर


