नरसिंह जयंती : श्री नारायण जी को नरसिंह रूप धारण करवाया, शाम को पंचामृत स्नान

भास्कर न्यूज | अमृतसर रविवार को शहर में नरसिंह जयंती श्रद्धा से मनाई गई। वहीं उत्तर भारत के प्रसिद्ध तीर्थ दुर्ग्याणा में कमेटी की ओर से श्री नारायण जी को नरसिंह रूप धारण करवाया। सुबह पंडितों ने मंत्रोच्चारण के साथ नरसिंह श्री नारायण जी की पूजा-अर्चना की। इसमें शहर के कई भक्तजन पहुंचे। जबकि शाम को मंदिर के मुख्य पुजारी ओमप्रकाश की ओर से ठाकुर जी का मंत्रोच्चारण से पंचामृत स्नान करवाया। जिसमें मंदिर के पदाधिकारी मुख्य रूप से शामिल हुए। इसी दौरान भजन मंडलियों की ओर से ठाकुर जी का गुणगान किया। मंदिर कमेटी की ओर से ठाकुर जी को विशेष भोग लगाया गया। इसका प्रसाद माथा टेकने आने वाले भक्तों में बांटा। इस मौके पर पंडित ओम प्रकाश ने नरसिंह भगवान के बारे भक्तों को बताया। उन्होंने कहा कि भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा को नरसिंह का रूप धारण किया। क्योंकि प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप प्रभु की भक्ति से मृत्यु न होने का वरदान मांगा। परंतु भगवान ने कहा कि जो जीव इस धरती पर आया है उसे एक न एक दिन यहां से जाना है। इसके बाद हिरण्यकश्यप सोच में पड़ गया और उसने भगवान से कहा कि मुझे न तो कोई जानवर मारे और न मनुष्य, न मैं दिन में मरू और न रात में, न धरती पर और न आकाश पर, न अस्त्र और न शास्त्र से। भगवान से वरदान मिलते ही हिरण्यकश्यप ने संतों समेत लोगों पर जुलम करने शुरू कर दिए। पापों का धड़ा भरने पर भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार धारण कर हिरण्यकश्यप का वध किया। भगवान ने हिरण्यकश्यप के वध की सारी शर्तें पूरी की। क्योंकि उस समय न दिन था न रात थी, न आकाश पर था और न धरती पर। भगवान के हाथ में न कोई अस्त्र था और न कोई शास्त्र था। न कमरे के अंदर था और न ही बाहर। भगवान का मुख सिंह यानि शेर और शरीर मनुष्य का धारण किया। उन्होंने हिरण्यकश्यप को अपनी जांघों पर लेटाया और खुद दहलीज पर बैठ गए। भगवान ने अपने हाथों के नाखूनों से हिरण्यकश्यप का पेट फाड़ कर मार डिया। इसी के बाद भगवान विष्णु का नाम नरसिंह पड़ा। इस मौके पर कई भक्तजन मौजूद रहे।

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