झारखंड में पेसा नियमावली लागू करने की घोषणा के बाद जिले में एक बार फिर बालू की समस्या के समाधान को लेकर लोगों में उम्मीद जगी है। हालांकि वर्ष 2025 की शुरुआत के बावजूद अब तक बालू घाटों की नीलामी नहीं हो सकी है, जिससे जिले में बालू संकट जस का तस बना हुआ है। स्थिति यह है कि आज भी सरकारी और गैर-सरकारी निर्माण कार्यों के लिए गढ़वा जिला पड़ोसी राज्य बिहार से आने वाले बालू पर निर्भर है। वर्ष 2025 में नवंबर-दिसंबर दो महीने के दौरान खनन विभाग द्वारा जिले के सोन और कोयल नदी में स्थित 18 बालू घाटों की ई-नीलामी तीन बार कराई गई, लेकिन एक भी बार संवेदकों ने इसमें रुचि नहीं दिखाई। विभाग ने इन घाटों के लिए कुल 718 करोड़ 21 लाख एक हजार 880 रुपए की आरक्षित राशि तय की थी। अत्यधिक राशि और स्पष्ट नीति के अभाव के कारण संवेदक आगे नहीं आए, जिससे नीलामी प्रक्रिया विफल रही। जिले में बालू की किल्लत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खनन विभाग के अंतर्गत पंजीकृत 16 स्टॉकिस्ट होने के बावजूद वहां भी पर्याप्त मात्रा में बालू उपलब्ध नहीं है। कुछ स्टॉकिस्टों के पास सीमित मात्रा में बालू जरूर है, लेकिन वह भी बिहार से मंगाकर आपूर्ति की जा रही है। स्थानीय स्तर पर बालू का अवैध उठाव किया जा रहा। इस बात की पुष्टि गढ़वा एसडीओ के दिन रात किए जा रहे छापेमारी से हो रही है। क्योंकि छापेमारी में लगातार बालू ढुलाई करते ट्रैक्टर भी पकड़े जा रहे हैं। भारतीय मजदूर संघ ने गढ़वा में बालू की समस्या पर कहा कि प्रशासन को आम लोगों को आसानी से बालू उपलब्ध करने की योजना बनाने की जरूरत है। बालू की किल्लत के कारण सबसे बड़ी परेशानी दैनिक मजदूरों को हुई है। प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए संघ के जिला मंत्री विश्वनाथ यादव ने कहा कि जिला प्रशासन यदि जल्द ही कोई कारगर पहल कर बालू को सर्व सुलभ नहीं करती है तो मजदूर संघ चरणवद्ध आंदोलन करने को विवश होगा। यूनियन के लोगों ने कहा कि उनका एक प्रतिनिधिमंडल उपायुक्त से मुलाकात कर अपनी बात रखेगा। छह वर्ष बीत जाने के बावजूद कोई ठोस समाधान सामने नहीं 2019 तक गढ़वा जिले में कुल 19 बालू घाट संचालित थे। इससे पहले वर्ष 2015 में जिले में 48 बालू घाटों की पहचान की गई थी, जिनमें से 21 घाटों के लिए टेंडर निकाले गए थे। उस समय 19 घाटों की बंदोबस्ती तीन वर्षों के लिए की गई थी, जो निर्धारित अवधि तक सफलतापूर्वक संचालित हुई, लेकिन इसके बाद से अब तक घाटों की नई बंदोबस्ती नहीं हो सकी है। करीब छह वर्ष बीत जाने के बावजूद कोई ठोस समाधान सामने नहीं आ पाया है। इसी बीच राज्य सरकार द्वारा पेसा नियमावली लागू करने की घोषणा से स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों में नई उम्मीद जगी है। माना जा रहा है कि पेसा कानून के तहत ग्राम सभाओं की भागीदारी बढ़ने से बालू घाटों के संचालन में पारदर्शिता आएगी।


