भास्कर न्यूज | इटखोरी शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन सोमवार को मां भद्रकाली मंदिर में हर साल की भांति इस वर्ष भी स्थानीय एवं बाहर से आए लगभग 56 श्रद्धालुओं ने कलश स्थापना कर दुर्गा सप्तशती का पाठ और पूजन शुरू की। माता रानी के गर्भगृह में सरकारी तौर पर मंदिर प्रबंधन द्वारा सरकारी तौर पर प्रधान कलश स्थापित किया गया है। इसके बाद मंदिर के आंगन एवं बरामदे में 55 कलश का स्थापना हुआ है। मंदिर में कुल मिलाकर 56 कलश स्थापित कर दुर्गा सप्तशती का पाठ और पूजन किया जा रहा है। कोई फलाहार तो कोई अल्पाहार रहकर मां की आराधना में जुटे हुए हैं। यहां दोनों प्रदेशों के कोने-कोने से आए भक्त मां की भक्ति की शक्ति में लीन होकर मां भद्रकाली से क्षमा याचना कर रहे हैं। शारदीय नवरात्र को लेकर मंदिर प्रांगण में चहल-पहल का माहौल है। सुबह और शाम यहां बज रहे शंख ध्वनियों से भक्ति की बयार बह रही है। उल्लेखनीय है कि भद्रकाली मंदिर में कई दशकों से शारदीय नवरात्र पर कलश स्थापना कर श्रद्धालुओं द्वारा दुर्गा सप्तशती का पाठ एवं पूजन करने का पौराणिक परंपरा है। यहां इटखोरी के उत्तर वाहिनी महानंद (मुहाने) नदी की तट पर शक्ति स्वरूपा माता भद्रकाली का मंदिर अवस्थित है। यह एकमात्र स्थल है जहां मां भद्रकाली सौम्य रूप में विराजमान हैं। इसलिए झारखंड के अन्य काली स्थानों की तरह यहां बकरे की बलि नहीं होती, बल्कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवताओं ने मां का विकराल रूप देखकर मां से क्षमा याचना की व मां के रौद्र रूप को शांत किया। इसके बाद उनकी सखियां मां महालक्ष्मी और मां सरस्वती का साथ पाकर वे यहां सौम्य अवतार धारण कर भद्रकाली बनकर यहां शिलारूप में परिवर्तित हो गई। उनकी मूर्ति के बांई ओर मां लक्ष्मी और दाहिनें ओर मां सरस्वती का स्थान बना हुआ है। इस जगह पर शक्ति के साथ विद्या और धन प्राप्ति तीनों के लिए भक्त आते रहते हैं। इसलिए यहां कुष्मांड, फल, नारियल और गन्ने की बलि दी जाती है। मंदिर के मुख्य पुरोहित नागेश्वर तिवारी ने बताया कि हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार शैलपुत्री देवी सती का अवतार थीं। इस अवतार में उन्होंने पहाड़ों के शासक राजा हिमवत की बेटी के रूप में जन्म लिया। इसलिए उन्हें शैलपुत्री नाम पड़ा। जहां शैल का अर्थ है पर्वत और पुत्री का अर्थ है बेटी। देवी सती का विवाह भगवान शिव से हुआ था।


