2014 के बाद देश एक मजबूत घरेलू अर्थव्यवस्था के निर्माण की दिशा में बढ़ रहा है। क्या आप साहित्य में इस पर कभी विचार कर रहे हैं। यह सवाल आज रायपुर साहित्य उत्सव के मुख्य मंच से पूर्व पत्रकार और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने उपस्थित साहित्यकारों से पूछा। उन्होंने कहा कि हमारे पड़ोसी ने आजाद होने के बाद अगले सौ बरस का सपना देखा और आज वह हमसे पांच गुना आगे है। जबकि हमने यह सपना 2014 के बाद देखा। मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि फ्रांस, रूस, वियतनाम से लेकर हमारे देश तक, दुनिया में होने वाली क्रांतियों में साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बाहरी आक्रमणकारियों के आगे जब हम अपना सब कुछ गंवाने की स्थिति में पहुंच रहे थे तब संत साहित्य ने हमारी चेतना को आकार दिया। राजनीति नहीं बल्कि साहित्य ही वो चीज है जो मनुष्य के मन और मस्तिष्क दोनों को बदलती है। आज जो कुछ सकारात्मक हो रहा है, उसे जन जन तक पहुंचाने की जरूरत है। नवा रायपुर के पुरखौती मुक्तांगन में तीन दिन के साहित्य उत्सव का शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने की। इस मौके पर अभिनेता मनोज जोशी, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा की कुलपति कुमुद शर्मा, लेखक अनंत विजय, लेखक-विचारक सुशील त्रिवेदी, छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष शशांक शर्मा, मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार पंकज झा उपस्थित रहे। क्या हमारा साहित्य यह देख नहीं पाया? हरिवंश ने कहा कि 80 के दशक तक हम अपने पड़ोसी देश से कई मोर्चों पर आगे थे। लेकिन आज वह हमसे पांच गुना आगे बढ़ गया है। क्या हमारी राजनीति उसको देख नहीं सकी? क्या हमने आशा छोड़ दी थी? देश को निराशा के गर्त में जाने की इजाजत दी थी? क्या हमारे महान साहित्यकारों की दृष्टि से यह सब ओझल रह गया? इस पर हमें गौर करना चाहिए। पड़ोसी ने आजाद होने के बाद अगले सौ बरस का सपना देखा कि हमें कहां पहुंचना है। हमने यह सपना 2014 के बाद देखा। जिन लोगों ने यह सपना देखा आप उनसे सहमत-असहमत हो सकते हैं लेकिन यह सपना देखना क्या हमारे पहले के लोगों का फर्ज नहीं था? यह सवाल क्या हमारे मन में नहीं उठना चाहिए? लोग रायपुर को विनोद कुमार शुक्ल के नाम से जानते हैं: साय मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि समुद्रमंथन से अमृत भी निकला था और विष भी। स्वतंत्रता संग्राम में भी विष और अमृत दोनों निकले। विष हमारे सेनानियों ने पिया और आजादी का अमृत हमारी आने वाली पीढ़ियों को दिया। आज अगर हम एक आजाद देश में लोकतांत्रिक ढंग से रह रहे हैं तो इसके पीछे हमारे स्वाधीनता सेनानियों की बड़ी भूमिका है। इनमें लेखक भी थे, पत्रकार भी और वकील भी। माखनलाल चतुर्वेदी ने बिलासपुर जेल में पुष्प की अभिलाषा लिखी। मातृभूमि के लिए लिखी गई इस कविता ने लाखों लोगों को राष्ट्र के लिए बलिदान देने के लिए प्रेरित किया। सप्रे जी के बारे में कहना कठिन है कि उनका स्वाधीनता आंदोलन में अधिक योगदान था या साहित्य में। पं. लोचनप्रसाद पांडेय ने इतिहास के नायकों को अपनी लेखनी में जगह देकर स्वतंत्रता आंदोलन को दिशा दी। उस जमाने की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिका सरस्वती थी जिसमें छपना लेखकों के लिए गर्व का विषय होता था। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी को इसके संपादन की जिम्मेदारी मिली थी। हमें खुशी है कि हमने मुक्तबोध, बख्शीजी और बलदेव प्रसाद मिश्र की स्मृतियों को राजनांदगांव के त्रिवेणी में संजो कर रखा है। पिछली भाजपा सरकार में भी हमने साहित्य उत्सव का भव्य आयोजन किया था।


