निगम ने बिना एनओसी-प्लानिंग टेंडर लगाया, 15 माह की देरी से लागत 78 लाख से 1.25 करोड़ हुई

दुगरी रोड पर लगने वाला ट्रैफिक जाम अब केवल ट्रैफिक समस्या नहीं, बल्कि नगर निगम की लापरवाही और सिस्टम फेलियर की बड़ी मिसाल बन गया है। दुगरी नहर पुल को चौड़ा करने (अपग्रेडेशन) का तीन महीने में पूरा होने वाला प्रोजेक्ट 15 माह बीत जाने पर शुरू तक नहीं हो सका है। भास्कर इन्वेस्टिगेशन में सामने आया है कि निगम ने बिना जरूरी मंजूरी के पहले टेंडर जारी कर दिए और कांट्रेक्टर को काम अलॉट करते हुए हल्का आत्म नगर के विधायक से बिना तैयारियों के नींव पत्थर रख दिया। प्रोजेक्ट नहरी विभाग की आपत्ति के कारण ठप है। उधर, जब इस बाबत विधायक कुलवंत सिंह सिद्धू से बात की गई तो उन्होंने दावा किया कि पुल को रिडिजाइन किया जाएगा। इसके लिए नहरी विभाग की मंजूरी ले ली गई है। बता दें कि स्मार्ट सिटी मिशन के तहत पुल की चौड़ाई 12 फीट तक बढ़ाई जानी थी। दुगरी से आत्म नगर पुलिस चौकी की ओर जाने वाले हिस्से को चौड़ा करना था। लेकिन आज प्रोजेक्ट कागजों में उलझा हुआ है और लोग रोज़ जाम से जूझ रहे हैं। पूरा काम दोबारा करना होगा मौजूदा सुपरिटेंडेंट इंजीनियर शाम लाल गुप्ता ने माना, पहले डिजाइन गलत बना था। दिल्ली की एक कंपनी से सर्वे करवाकर नए तकनीकी मानक अनुसार नया डिजाइन तैयार होगा। पुराने पुल को भी नई तकनीक से ऊंचा उठाया जाएगा। यानि निगम की लापरवाही के कारण अब पूरा काम दोबारा करना पड़ेगा। निगम की लापरवाही का बोझ जनता पर शुरुआती लागत 78-79 लाख रुपये थी। जो अब 1.25 करोड़ रुपए होने की पुष्टि खुद निगम अधिकारियों ने की है। यानी, निगम की लापरवाही का बोझ खजाने और जनता पर पड़ेगा। इससे गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। बिना विभागीय तालमेल के टेंडर क्यों जारी हुआ? बिना तकनीकी मंजूरी के नींव पत्थर क्यों रखवाया? गलत डिजाइन क्यों तैयार हुआ, और इसे डिजाइन करने वाले कौन जिम्मेदार थे। पुल की बढ़ी लागत कैसे पूरी होगी। आबादी बढ़ी, पुल छोटा पड़ा, जाम बना रोजमर्रा की परेशानी दुगरी और आसपास आबादी बढ़ी है। मल्टीस्टोरी बिल्डिंग्स, कॉलोनियां और व्यावसायिक गतिविधियों के चलते वाहनों की संख्या कई गुना बढ़ चुकी है। लेकिन सिधवां नहर पर बना दुगरी पुल ट्रैफिक के लिहाज से छोटा था। आज भी यहां रोज़ाना लंबा जाम लगता है। स्कूली बच्चे, ऑफिस जाने वाले लोग और एंबुलेंस तक फंस जाती हैं। पुराने डिजाइन पर हुआ टेंडर जारी, नहरी विभाग ने मंजूरी रोकी जांच में पाया, निगम ने नहरी विभाग से एनओसी लिए बिना टेंडर जारी कर ठेकेदार को काम अलॉट कर दिया। तत्कालीन सुपरिटेंडेंट इंज. संजय कंवर ने एनओसी मांगी पर नहरी विभाग ने साफ इनकार कर दिया। विभाग ने स्पष्ट किया कि नियम अनुसार पुल का डिजाइन बाढ़ की स्थिति में नीचे से किश्ती (नाव) निकलने में सक्षम होना चाहिए। लेकिन निगम इंजीनियरों ने पुराने पुल के आधार पर ही डिजाइन बनाया गया।

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