नीमच जिले के ग्राम भाटखेड़ी के प्रगतिशील किसान कमलाशंकर विश्वकर्मा, जिन्हें ‘बैंबू मैन’ के नाम से जाना जाता है, को प्रतिष्ठित “प्रोफेसर रतनलाल अवॉर्ड्स फॉर एक्सीलेंस इन रिजनरेटिव एग्रीकल्चर – 2025” से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान उन्हें पुनर्योजी कृषि और मिट्टी की सेहत सुधारने के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए प्रदान किया गया। यह अवॉर्ड कृषि मंत्रालय, भारत सरकार के भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अधीन इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सॉइल साइंस, भोपाल (IISS) और अंतरराष्ट्रीय संस्था सॉलिडैरिडाड के संयुक्त तत्वावधान में शुरू की गई विशेष श्रृंखला के तहत दिया गया। इसका शुभारंभ “विश्व मृदा दिवस” के अवसर पर हुआ था। देश भर से चयनित 14 विशेषज्ञों और किसानों में कमलाशंकर विश्वकर्मा को ‘फार्मर (इंडिविजुअल)’ श्रेणी में यह सम्मान मिला। उन्हें मृदा स्वास्थ्य सुधार, जैविक व रिजनरेटिव खेती की उन्नत तकनीकों को अपनाने और बांस आधारित खेती-उद्यम के माध्यम से टिकाऊ आजीविका का सफल मॉडल विकसित करने के लिए सराहा गया। विश्वकर्मा ने अपने खेतों में फसल विविधीकरण, फसल अवशेष प्रबंधन, जैविक खाद तथा बांस के रोपण को बढ़ावा दिया है। इन प्रयासों से उन्होंने मिट्टी में कार्बन बढ़ाने और रासायनिक खादों पर निर्भरता घटाने की दिशा में उल्लेखनीय परिणाम हासिल किए हैं। पुरस्कार वितरण समारोह भोपाल के होटल कोर्टयार्ड बाय मैरियट में आयोजित हुआ। इसमें भारत रत्न डॉ. एम. एच. मेहता, राष्ट्रीय मृदा विज्ञान संस्थान के डायरेक्टर डॉ. मनोरंजन मोहंती, डॉ. शताद्रु चट्टोपाध्याय और डॉ. सुरेश मोटवानी ने उन्हें सम्मानित किया। समारोह में उपस्थित वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं ने कमलाशंकर विश्वकर्मा जैसे किसानों को पुनर्योजी कृषि का प्रेरक उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे किसान मृदा, पर्यावरण और किसान की आय तीनों की सुरक्षा करते हुए नई पीढ़ी के लिए टिकाऊ खेती का रास्ता दिखा रहे हैं।


