‘नेता अफसर मिलकर सरकारी नौकरी खा जावे,
पेपर आउट करवावे, अपनों का नंबर आवे।’ इन लाइनों के साथ राजस्थान के प्रसिद्ध ऐतिहासिक हेला ख्याल संगीत दंगल में लक्ष्मीनाथ मंडल ने राजनीति पर गायन शैली में कटाक्ष किया। दरअसल, 275 साल पुरानी परंपरा को निभाते हुए गणगौर (चैत्र शुक्ल तृतीया) पर दौसा के लालसोट में जवाहरगंज सर्किल पर दंगल की शुरुआत हुई। इसमें दौसा, टोंक, जयपुर के अलावा पूरे राजस्थान से हजारों लोगों की भीड़ जुटी। लगातार 36 घंटे तक चलने वाले आयोजन में पीढ़ियों से चली आ रही गायन शैली को फिर से जीवंत किया। भवानी पूजा के बाद मंगलवार रात से दंगल की शुरुआत हुई, जो 3 अप्रैल की सुबह तक चलेगा। दंगल में कुल 12 गायन मंडलियां हिस्सा ले रही हैं। इनमें 6 मंडलियां स्थानीय हैं और 6 बाहर से आई हैं। मंडलियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से देश की राजनीति, भ्रष्टाचार और आतंकवाद जैसे राष्ट्रीय मुद्दों के साथ-साथ स्थानीय समस्याओं पर भी जमकर कटाक्ष किए। पढ़िए… दंगल की वो रचनाएं, जिनकी रही चर्चा जुग-जुग जीवो योगी भाई… धन-धन योगी जी, याकी नेताई,
धागे धर्म ध्वजा उठाई।
मंदिर राम को दियो बणयाई,
मंदिर की शोभा बरनी जाई। थाने खुब ही ख्याति पाई,
हो, जनता देख-देख हरसाई।
सनातन की बात बणाई रे,
जुग-जुग जीवो योगी भाई। होनहार बलवान है, ये बणी-बणई बात रे … होनहार बलवान है, ये बणी-बणई बात रे,
“खूब विकास करायो, फिर जनता ने नहीं दिया साथ है।”
स्कूल, अस्पताल बणवाया, शिक्षा-स्वास्थ्य अभियान रे।
हो, सब मन ही मन पछतावें, परसादी लाल ही भावें।
झाड़-झाड़ में बन गया नेता, दलालों की बण जायें,
राजनीति का स्तर गिर जायें। पांच जिलों से पहुंचते हैं लोग हेला ख्याल संगीत दंगल समिति के अध्यक्ष रामफूल सैनी ने बताया कि इस बार विशेष तैयारियां की गई हैं। दौसा, सवाई माधोपुर, करौली, जयपुर और टोंक सहित आसपास के जिलों से लोग इसमें भाग ले रहे हैं। हजारों की संख्या में दर्शक दंगल देखने पहुंच रहे हैं। 12 मंडल दंगल में ले रहे भाग
लालसोट के श्री लक्ष्मीनाथ मंडल, सैनी मंडल, महाकाली मंडल, पारख मंडल, गणेश मंडल, शिव मंडल और रानीला के श्री हेला ख्याल व शर्मा मंडल, बरनाला का बाजार गढ़ मंडल, गंडाला का राधा रमन मंडल, रायपुर का चतुर्वेदी मंडल, सीतोड़ का श्री देवनारायण मंडल पहले चरण में भाग लेंगे। कई बदलावों के दौर से गुजरा संगीत दंगल सैनी ने बताया कि दंगल का स्वरूप समय के साथ बदला है। पहले यह झरंडा चौक पर होता था, जहां तीन और चार बास की गायन मंडलियां भाग लेती थीं। 1961 में जब यह और लोकप्रिय हुआ, तब इसे जवाहर गंज सर्किल में स्थानांतरित किया गया। शुरुआती दौर में तेल की मशालों की रोशनी में कलाकार अपनी प्रस्तुति देते थे, जिनका प्रबंध तत्कालीन राजा द्वारा किया जाता था। पहले सामाजिक मुद्दे, अब राजनेताओं पर कटाक्ष उन्होंने बताया- पहले हेला ख्याल के जरिए सामाजिक बुराइयों पर कटाक्ष किया जाता था और धार्मिक कथाएं प्रस्तुत की जाती थीं। लेकिन समय के साथ इसमें राजनीतिक व्यंग्य और समसामयिक मुद्दे भी शामिल होने लगे हैं। पहले की गायन मंडलियां तुकबंदी के जरिए प्रश्न पूछती थीं, जिसका जवाब अगली मंडली को देना होता था, लेकिन अब यह प्रथा लगभग खत्म हो चुकी है। पेशेवर नहीं, लेकिन समर्पित कलाकार हेला ख्याल संगीत दंगल के कलाकार कोई पेशेवर गायक नहीं होते। वे होली के बाद से गुरु (जिसे मेडिया कहा जाता है) के मार्गदर्शन में अभ्यास शुरू करते हैं और फिर गणगौर के आयोजन में हजारों दर्शकों के बीच अपनी प्रस्तुति देते हैं। हर गायन मंडली में 40-50 कलाकार शामिल होते हैं, जो हारमोनियम, ढोलक, मंजीरा, चिमटा और घेरे जैसे वाद्ययंत्रों के साथ अपनी प्रस्तुति देते हैं। आज भी लोकप्रिय हैं हजारीलाल ग्रामीण की रचनाएं इस दंगल को लोकप्रिय बनाने में स्व. गोपीलाल जोशी, प्यारेलाल जोशी, मुथरेश जोशी, कल्याण प्रसाद मिश्र, गिरधारीलाल सैनी, रामप्रताप जैसे कलाकारों का योगदान रहा है। लेकिन लोक कवि हजारीलाल ग्रामीण की रचनाएं आज भी लोगों की जुबां पर हैं। उनकी लिखी ‘आई रे गणगौर’, ‘बूढ़ा नवल किशोर, खुशी चहुंओर’ जैसी रचनाएं आज भी इस संगीत परंपरा का अभिन्न हिस्सा बनी हुई हैं। प्रवासी भी लौटते हैं इस अनूठे आयोजन के लिए गणगौर की पहली रात भवानी पूजन के बाद शुरू होने वाला यह संगीत दंगल लगातार 36 घंटे चलता है। प्रवासी राजस्थानी, जो पीढ़ियों पहले लालसोट छोड़ चुके हैं, वे भी इसे सुनने के लिए लौटते हैं। 275 साल बाद भी यह दंगल केवल एक संगीत आयोजन नहीं, बल्कि राजस्थान की जीवंत लोकसंस्कृति का प्रतीक बना हुआ है।


