पर्यावरण बचाने के लिए संघर्ष:अरावली बचाने के लिए 3 जिलों में लोग सड़कों पर, मुख्यमंत्री बोले-अरावली से छेड़छाड़ नहीं होने दूंगा

सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली पर्वतमाला की परिभाषा तय करने के लिए केंद्र के प्रस्ताव को मंजूरी दिए जाने के बाद नया पर्यावरणीय विवाद खड़ा हो गया है। कोर्ट ने 100 मी. से ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली का हिस्सा मानने पर सहमति जताई है। 692 किमी लंबी इस पर्वतमाला का 550 किमी का हिस्सा राजस्थान में आता है, इसलिए वहां इस फैसले के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर रहे हैं। इधर, सीएम भजनलाल शर्मा ने झालावाड़ में कहा कि अरावली से किसी हाल में छेड़छाड़ नहीं होने दूंगा। सोमवार को जोधपुर, उदयपुर और सीकर समेत कई शहरों में प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं। जोधपुर में लाठीचार्ज हुआ। कई लोगों को हिरासत में ले लिया गया। सीकर में प्रदर्शनकारियों ने अरावली का हिस्सा 945 मी. ऊंचे हर्ष पर्वत की चोटी पर पहुंचकर प्रदर्शन किया। यहां खनन नहीं होने देंगे “अरावली पर्वत शृंखला को लेकर कांग्रेसी रोज नया शिगूफा छोड़ रहे हैं, मैं खुद बृजवासी हूं, गोवर्धन की पूजा करता हूं, ऐसे में अरावली के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं होने दूंगा। अरावली पर्वतमाला पर सुप्रीम कोर्ट के दिए गए फैसले पर कहा कि हम अरावली में खनन नहीं होने देंगे।”
-भजन लाल शर्मा, सीएम (झालावाड़ में एक कार्यक्रम में) केंद्रीय मंत्री से सवाल; अरावली में 100 मी. ऊंची भू-आकृति ही पहाड़ का आधार क्या? “अरावली में कोई शिथिलिता नहीं दी गई है। कुछ यूट्यूबर्स ने कन्फ्यूजन पैदा किया है कि 100 मीटर यानि टॉप के 100 मीटर। पर्वत की आधार संरचना अगर जमीन के अंदर भी 20 मीटर है तो वहां से लेकर 100 मीटर तक प्रोटेक्शन है। इस परिभाषा के आने के बाद 90% से ज्यादा क्षेत्र संरक्षित होगा। सिर्फ 2 प्रतिशत क्षेत्र में माइनिंग हो सकती है उसमें भी नियम लागू हैं।”
-भूपेंद्र यादव, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भास्कर इनसाइट- ‘अरावली बचाइए, अरावली सुरक्षित है’ जैसे ट्रेंड के साथ अवैध खनन पर छिड़ी बहस 100 मीटर से कम ऊंचाई के पहाड़ों को अरावली शृंखला से बाहर करने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला चर्चा में है। अरावली बचाइए और अरावली सुरक्षित है जैसे कई ट्रेंड सोशल मीडिया पर चल रहे हैं। दरअसल, अरावली में खनन का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबे समय से है। दो मामले विशेष हैं। पहला मामला एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (1985) का था। दूसरा केस टी.एन. गोदावर्मन थिरुमलपाद बनाम भारत संघ (1995) का है, जिसके तहत राजस्थान के अरावली क्षेत्र में खनन की समीक्षा की जा रही थी। जनवरी 2024 में गोदावर्मन केस की सुनवाई में सवाल उठा कि कुछ खदानें वास्तव में अरावली के भीतर आती हैं या उससे बाहर हैं। पता चला कि अलग-अलग राज्य अरावली की परिभाषा अलग-अलग मानते थे। जिससे खनन पर नियंत्रण मुश्किल था। ऐसे में कोर्ट ने एक कमेटी बनाई जो अरावली की समान परिभाषा तय करे। कमेटी ने अरावली की परिभाषा दी… कोई भी ऊंचा हिस्सा जो अपने आसपास के सबसे निचले स्तर से 100 मीटर या उससे ऊंचा हो, उसे अरावली कहेंगे। वहीं एक-दूसरे से 500 मीटर के अंदर स्थित दो पहाड़ियां मिलकर अरावली रेंज बनाएंगी। कोर्ट ने मानी कमेटी की सिफारिश पॉजिटिव पहलू – नई खनन लीज बंद, संवेदनशील इलाकों में खनन नहीं होगा कोर्ट के फैसले में कहा गया है, अरावली में अभयारण्य, टाइगर रिजर्व, टाइगर कॉरिडोर और इको-सेंसिटिव जोन जैसे संवेदनशील इलाकों में खनन पूरी तरह बंद कर दिया जाए। अरावली पहाड़ियों व रेंज में टिकाऊ खनन सुनिश्चित करने के लिए कोई नई खनन लीज नहीं दी जाए, सिवाय क्रिटिकल, स्ट्रैटेजिक और एटॉमिक मिनरल्स के मामलों के।
सवाल जिनके जवाब जानना जरूरी है… Q. क्या 0.19% क्षेत्र ही खनन योग्य है?
यह प्रतिशत कोर्ट के आदेश में कहीं भी आधिकारिक रूप से नहीं दिया गया है। Q. शेष अरावली क्या सुरक्षित है?
100 मीटर लोकल रीलिफ की शर्त के कारण निम्न-ऊंचाई की दबी हुई अत्यधिक अपक्षयग्रस्त अरावली संरचनाएं परिभाषा से बाहर हो जाती हैं, जबकि वे भूवैज्ञानिक रूप से अरावली ही हैं। Q. पहले गलत नियम थे, इसलिए नया नियम लाया गया? इस आदेश में चूक कहां है विरोध क्यों… व्यावसायिक प्रोजेक्ट आएंगे, अवैध खनन बढ़ेगा भास्कर एक्सपर्ट – अरावली विकास प्राधिकरण बने “अरावली विकास प्राधिकरण का गठन हो। इससे एक ही जगह सभी राज्यों की सुनवाई होगी। पूरी अरावली का लाइडार बेस्ड ड्रोन सर्वे हो। राष्ट्रीय महत्व के खनिजों को छोड़कर खनन पर रोक लगे। अरावली को यूनेस्को हेरिटेज का दर्जा मिले।” -प्रो. लक्ष्मीकांत शर्मा अरावली शोधकर्ता, राज. सेंट्रल विवि इकोलॉजी के सर्वे करवाएं “ऊंचाई के हिसाब से अरावली को परिभाषित नहीं किया जा सकता। एन्वायरन्मेंट इम्पैक्ट एनालिसिस व एरिया आइडेंटिफाय हो। ग्राउंड रिएलिटी देखें, इकोलॉजी के सर्वे कराएं, मिनरल वाइज क्षेत्रों की पहचान करनी होगी।” -प्रो. अनिल कुमार छंगाणी एमजीएस यूनिवर्सिटी, बीकानेर

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