पलामू में वन विभाग और वाइल्ड लाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो ने वन्यजीव तस्करी के एक बड़े अंतरराष्ट्रीय रैकेट का पर्दाफाश किया है। रैकेट को पकड़ने के लिए ज्वाइंट अभियान 18 नवंबर से चल रहा था। शुरुआती कार्रवाई छतरपुर पश्चिमी वन प्रक्षेत्र की ओर से हरिहरगंज में की गई। टीम ने औरंगाबाद जिले के देव से एक पिता-पुत्र और हरिहरगंज के एक व्यवसायी सहित तीन तस्करों को गिरफ्तार किया गया। इनके पास से लगभग 1200 मिलीलीटर सांप का जहर और करीब 20 किलोग्राम पेंगोलिन के शल्क बरामद हुए। अधिकारियों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय बाजार में जब्त जहर की कीमत लगभग 80 करोड़ रुपए और पेंगोलिन शल्क की कीमत करीब 20 लाख रुपए आंकी गई है। इतनी बड़ी मात्रा में बरामदगी से यह साफ हो गया कि यह तस्करी स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि सीमा पार के नेटवर्क से भी जुड़ी है।
जांच में खुलासे के बाद दूसरी कार्रवाई, कुल 10 आरोपी गिरफ्तार पहली कार्रवाई के बाद वन विभाग ने गिरफ्तार तस्करों से पूछताछ की। इस पूछताछ के आधार पर रैकेट के अन्य सदस्यों की पहचान हुई। पूछताछ में मिले इनपुट के आधार पर दूसरी छापेमारी की गई। इस दौरान राहुल कुमार, गोपाल प्रसाद सिंह, मानकी सिंह, शमीतुल्ला मियां, तैयब अंसारी, अनिल यादव और विनोद चंद्रवंशी सहित सात और आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। इनके पास से करीब 10 किलोग्राम पेंगोलिन का टुकड़ा बरामद किया गया। इस तरह कुल गिरफ्तारियों की संख्या 10 हो गई है। डीएफओ सत्यम कुमार ने बताया कि यह एक बड़ा और संगठित वन्यजीव तस्करी रैकेट है, जिसमें स्थानीय नेटवर्क के साथ-साथ बिहार और पलामू के तस्करों की संलिप्तता भी सामने आई है। उन्होंने कहा कि सांप के जहर की इतनी बड़ी मात्रा मिलना बताता है कि यह गिरोह लंबे समय से सक्रिय था। विभिन्न जगहों से जहर इकट्ठा कर अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई कर रहा था। मेड इन फ्रांस आईडी कार्ड से इंटरनेशनल लिंक की पुष्टि अधिकारियों ने बताया कि जब्त सांप के जहर के साथ एक आईडी कार्ड भी मिला है, जिस पर ‘मेड इन फ्रांस’ लिखा हुआ था। इस कार्ड ने जांच टीम की चिंताएं और बढ़ा दी हैं। इससे साफ संकेत मिल रहा है कि यह नेटवर्क विदेशी बाजारों से भी जुड़ा हुआ था। जहर की सप्लाई किसी इंटरनेशनल चैनल के माध्यम से की जाती थी। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि पकड़े गए तस्करों का विदेशी गिरोहों से क्या संबंध है। सांप के जहर को किस रास्ते से अंतरराष्ट्रीय बाजार में भेजा जाता था। वन विभाग का कहना है कि इस रैकेट के पीछे और भी कई लोग हो सकते हैं। जिनकी पहचान की जा रही है। फिलहाल पूरे मामले की जांच तेज कर दी गई है।


