भास्कर न्यूज | लुधियाना पार्षद पति कांग्रेसी नेता इंद्रजीत सिंह (इंदी) को गिरफ्तारी के बाद रविवार को अदालत में पेश किया गया था। जहां जज शानू गोयल की अदालत ने इंद्रजीत सिंह को रिलीज करते हुए केस को भी खारिज कर दिया है। जानकारी के अनुसार थाना डिवीजन-8 की पुलिस ने बिना केस दर्ज किए इंद्रजीत सिंह को गिरफ्तार किया था। इसके साथ ही गिरफ्तारी से पहले कोई नोटिस भी जारी नहीं किया था। जब अदालत में सुनवाई हुई तो इंद्रजीत सिंह के वकील ने गिरफ्तारी के समय के वीडियो दिखाए। जिससे साबित हुआ कि केस दर्ज होने से पहले और बिना नोटिस के गिरफ्तारी हुई है। इसलिए पुलिस की लापरवाही को देखते हुए केस को रद्द करते हुए रिहा करने के आदेश दिए। वहीं, बता दें कि इंद्रजीत सिंह पर आरोप है कि उन्होंने नगर निगम की बागवानी शाखा के तहत सर्किल इंचार्ज विजय कुमार के साथ रखबाग में मारपीट करने के आरोप लगे थे। इसके चलते शनिवार को केस दर्ज करने के बाद उन्हें गिरफ्तार किया। किसी भी आपराधिक घटना की सूचना या शिकायत मिलने पर पुलिस सबसे पहले भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं में पर्चा दर्ज करती है। पर्चा दर्ज होने के बाद मामले की धाराओं की गंभीरता देखी जाती है कि अपराध संज्ञेय है या असंज्ञेय और जमानती है या गैर-जमानती। इसी आधार पर आगे की कार्रवाई तय होती है। फिर केस का जांच अधिकारी घटनास्थल पर जाकर सबूत जुटाता है। इसके साथ ही धारा 161 बीएनएस के तहत गवाहों के बयान दर्ज करता है। अगर मामला चोट, मौत या किसी गंभीर अपराध से जुड़ा हो, तो मेडिकल और फॉरेंसिक रिपोर्ट भी मंगाई जाती है। पुलिस हर मामले में सीधे गिरफ्तारी नहीं करती। पहले यह आंकलन किया जाता है कि आरोपी के फरार होने की संभावना तो नहीं है, वह सबूतों से छेड़छाड़ कर सकता है या गवाहों को धमका सकता है। इसके साथ ही 35 बीएनएस के तहत पुलिस को गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में दर्ज करना जरूरी है। अगर पुलिस को लगता है कि आरोपी जांच में सहयोग कर सकता है, तो उसे सीधे गिरफ्तार करने की बजाय नोटिस ऑफ अपीयरेंस दिया जा सकता है। यह नोटिस धारा 35(3) बीएनएसएस के तहत दिया जाता है। नोटिस की शर्तों का पालन नहीं करने या जांच में सहयोग न करने पर पुलिस आरोपी को गिरफ्तार कर सकती है। अगर पुलिस BNS/BNSS में तय गिरफ्तारी नियमों का पालन नहीं करती, तो नियमों की अनदेखी पर अदालत गिरफ्तारी को अवैध मान सकता है। ऐसे मामलों में आरोपी को तुरंत जमानत मिल सकती है और पुलिस रिमांड भी खारिज हो जाती है। अवैध गिरफ्तारी से जुटाए गए बयान और बरामदगी कोर्ट में कमजोर पड़ जाते हैं। वहीं, दोषी पुलिस अफसरों पर विभागीय कार्रवाई, सस्पेंशन और मुआवजा देने तक के आदेश हो सकते हैं। हाईकोर्ट एफआईआर या चार्जशीट के हिस्से भी रद्द कर सकता है।


