भास्कर न्यूज । लुधियाना पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (पी.ए.यू.) के कृषि मौसम विज्ञान एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना के तहत तीन दिवसीय वार्षिक समूह बैठक का शुभारंभ डॉ. खेम सिंह गिल किसान सलाहकार सेवा केंद्र में हुआ। इस बैठक में असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल सहित देश के विभिन्न राज्यों के कृषि मौसम वैज्ञानिक भाग ले रहे हैं। पीएयू में ही इन वैज्ञानिकों के लिए 1 से 5 दिसंबर तक पांच दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम भी आयोजित किया जाएगा। बैठक में समस्तीपुर (बिहार), बेंगलुरू (कर्नाटक) और लुधियाना केंद्रों को कृषि मौसम विज्ञान के क्षेत्र में उत्कृष्ट शोध और विकास योगदान के लिए सर्वोत्तम केंद्र पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आयोजन के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), नई दिल्ली के प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन विभाग के उप महानिदेशक डॉ. एके नायक शामिल हुए। उन्होंने बदलते जलवायु परिदृश्यों के कारण कृषि पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों का उल्लेख करते हुए सूक्ष्म स्तर पर मौसम पूर्वानुमान क्षमता विकसित करने और उसके अनुरूप कृषि मॉडल तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसानों को वर्षा, सूखे, आंधी-तूफान, अत्यधिक तापमान आदि से संबंधित पूर्व चेतावनी प्रणाली को और अधिक सुदृढ़ बनाए जाने की जरूरत है, ताकि कीट व रोग प्रबंधन के लिए अग्रिम उपाय अपनाए जा सकें और स्थायी कृषि को बढ़ावा मिले। हैदराबाद स्थित केंद्रीय शुष्कभूमि कृषि अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. वी.के. सिंह ने कहा कि पारंपरिक मौसम पूर्वानुमान विधियां अब पर्याप्त नहीं हैं, इसलिए कृषि मौसम वैज्ञानिकों को नवीन तकनीकों का उपयोग कर अधिक सटीक प्रणालियां विकसित करनी होंगी। उन्होंने फसलों की उत्पादकता और रोग-मुक्त उत्पादन सुनिश्चित करने में कृषि मौसम विज्ञान की अनिवार्य भूमिका को रेखांकित किया। किसान-उन्मुख मौसम सूचना प्रणालियां विकसित की जाएं: विशिष्ट अतिथि, पीएयू के शोध निदेशक डॉ. अजमेर सिंह ढट ने उत्तर भारत की कृषि को मजबूत बनाने में यूनिवर्सिटी के योगदान का उल्लेख किया। साथ ही, मौसम की अनिश्चितता व प्राकृतिक संसाधनों पर खतरे को देखते हुए विभिन्न कृषि विज्ञान शाखाओं के समन्वय और कारगर सूचना प्रणाली के विकास की आवश्यकता बताई। उन्होंने 2015 में कपास पर सफेद मक्खी के प्रकोप और 2023 व 2025 की बाढ़ को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हुए बेहतर रणनीतियों की आवश्यकता पर बल दिया। कृषि कॉलेज के डीन डॉ. चरणजीत सिंह औलख ने भी बदलते मौसम के कृषि पर आर्थिक प्रभावों का जिक्र करते हुए किसान-उन्मुख मौसम सूचना प्रणालियों के विकास पर जोर दिया। परियोजना संचालक डॉ. एस.के. बल्ल ने इस कार्यशाला के उद्देश्य साझा किए और देश में मौसम विज्ञान अनुसंधान के क्षेत्र में चल रहे प्रयासों की जानकारी दी। किसानों तक मौसम आधारित कृषि सिफारिशें पहुंचाने के कार्य में 21 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में 25 नियमित और 5 अनियमित केंद्र सक्रिय हैं। विभागाध्यक्ष डॉ. पवनीत कौर ने दिया और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. पीके द्वारा किया गया।


