पुरखौती मुक्तांगन उजाड़ जैसी हालत में:आदिवासियों के पुतलों का सिर गायब, उनके घरों के मॉडल हो गए खंडहर, कृत्रिम झरना महीनों से सूखा

नवा रायपुर का पुरखौती मुक्तांगन यानी छत्तीसगढ़ की जीवंत संस्कृति। छत्तीसगढ़ी संस्कृति को बाहर से आने वाले लोग करीब से जाने और समझें, इसलिए 2006 में इसके पहले फेज का उद्घाटन किया गया। 2012-13 में दूसरे फेज का उद्घाटन हुआ। अभी तीसरे अंबिकापुर सेक्टर का उद्घाटन बाकी है और ये उजाड़ सी हो गई है। आदिवासी संस्कृति के प्रतीक के तौर पर बनाए उनके पुतलों के हाथ-पांव तो दूर कहीं कहीं सिर तक गायब हैं। आदिवासियों के घरों के मॉडल की चारदीवारी ढह चुकी है। टीन के पुतलों के भी छोटे-छोटे हिस्से गायब हैं। 1 करोड़ सालाना केवल टिकट से आय होने के बावजूद पुरखौती मुक्तांगन के मेंटेनेंस में केवल खानापूर्ति की जा रही है। भास्कर टीम अवकाश के दिन पुरखौती मुक्तांगन पहुंची। गेट बंद था। एक भी पर्यटक नहीं थे। भीतर पहुंचने पर तीन लोगों का स्टाफ नजर आया। भीतर एंट्री के रास्ते में दोनों ओर आदिवासियों के अलग-अलग स्टैच्यू नजर आए।
विभाग को हर साल एक करोड़ की कमाई हो रही है। बड़ी आय होने के बावजूद पूरे मुक्तांगन में लोगों को जरूरी सुविधाएं तक नहीं मिल रही हैं। पानी तक के लिए लोगों को भटकना पड़ रहा है। पूरे परिसर में कहीं बी पीने का पानी का इंतजाम नहीं है। गिने-चुने यूरिनल हैं, लेकिन उनमें भी ताले लगे हैं। जंग लगे ताले बता रहे हैं कि इन्हें कई महीनों से नहीं खोला गया है। मूर्तियां टूट-फूट गई हैं। मॉडल के तौर पर बनाए गए आदिवासियों के घर और झोपड़ियों की बाउंड्री बिखर गईं है। इस खुले संग्रहालय को नैचुरल टच देने के लिए बनाया गया कृत्रिम झरना सूख गया है। रायपुर में रहने वाले लोगों के लिए पुरखौती अब घूमने जाने या मेहमानों को ले जाने लायक जगह नहीं रह गई है। पिछले सालभर में महज पांच विदेशी पर्यटक पुरखौती पहुंचे हैं।
संस्कृति के नाम पर सिर्फ घर और झोपड़ी
पुरखौती मुक्तांगन का बसाने का उद्देश्य आदिवासी लोगों के जीवन, रहन-सहन और संस्कृति से आम लोगों को परिचित कराना है। यहां पर अलग-अलग जनजातीय लोगों के आवास बनाए गए हैं। उनके सिर्फ आवासों की जानकारी मिल रही है। आदिवासी लोगों के बारे में तथा उनके रहन-सहन का पता नहीं चल रहा है। 46.89 लाख के तालाब में पानी नहीं
पुरखौती मुक्तांगन में नौकायन के लिए तीन साल पहले करीब 47 लाख रुपए की लागत से तालाब बनाने की योजना तैयार की गई थी। करीब 10 एकड़ जमीन को खोदकर छोड़ दिया गया। अफसरों का कहना था कि मुक्तांगन में बनने वाले तालाब के चारों ओर सैलानियों के बैठने की व्यवस्था होगी। पाथ-वे होगा। रंगीन लाइट से इसे सजाया जाएगा। चारों ओर हरियाली के लिए पेड़ पौधे लगाए जाएंगे। लेकिन अफसरों ने तालाब खुदवाने में ही भारी-भरकम रकम खर्च कर दी। तालाब में पानी का प्राकृतिक जलस्रोत ही नहीं है। इसलिए यहां पानी ही नहीं भरा। सीधी बात – विवेक आचार्य, एमडी, पर्यटन मेंटेनेंस कर रहे हैं, जो टूट-फूट है उसे सुधारेंगे पुरखौती मुक्तांगन का मेंटेनेंस तक नहीं किया जा रहा है?
-मूर्तियों की मरम्मत-पेंटिंग की गई है। नियमित सफाई हो रही।
पूरे परिसर में पीने के पानी के ​लिए कोई व्यवस्था नहीं है?
-पानी के लिए वाटर कूलर लगा रहे, सीएसआर से भी लगवा रहे।
46 लाख की बड़ी रकम खर्च कर तालाब खुदवाया, अभी सिर्फ गड्ढा है, पानी नहीं?
-उसमें पानी भरा था लेकिन उसका पार फोड़ दिया। इससे पानी बह गया।
सवाल : लोगों के लिए पुरखौती मुक्तांगन में अभी क्या नए काम कराए जा रहे हैं?
जवाब : गढ़ कलेवा शुरू कर रहे, सिविल काम हो चुका है, जल्द नए टेंडर होंगे। “

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