पूर्व-CJI बोले- बेल नियम है, सजा नहीं हो सकती प्री-ट्रायल:जयपुर में डी.वाई. चंद्रचूड़ ने जेन-जी, जस्टिस सिस्टम और अदालतों की कार्यप्रणाली पर खुलकर रखी बात

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कानून, लोकतंत्र, जमानत व्यवस्था और न्यायिक प्रणाली को लेकर बेबाक विचार रखे। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में जिंदगी से लेकर संवैधानिक मूल्यों तक उन्होंने कई अहम मुद्दों पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि वह भले ही बेबी बूमर पीढ़ी से आते हों, लेकिन उनकी दो बेटियां स्पेशल नीड्स वाली हैं और जेन-जी से हैं। अगर उन्हें अपनी बेटियों की जिंदगी से जुड़ा रहना है, तो उन्हें जेन-जी के काम करने और सोचने के तरीके को समझना और अपनाना होगा। अपनी हालिया किताब का जिक्र करते हुए चंद्रचूड़ ने कहा कि यह कोई सख्त कानूनी किताब नहीं, बल्कि उनके भाषणों का संग्रह है। इसमें अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट, भारतीय सुप्रीम कोर्ट और दार्शनिक जॉन स्टुअर्ट मिल, कांट जैसे विचारकों के संदर्भ स्वाभाविक रूप से शामिल हैं। उन्होंने बताया कि जब वह समलैंगिकता को अपराधमुक्त करने वाला ऐतिहासिक फैसला लिख रहे थे, तब उन्हें मशहूर कवि-गायक लियोनार्ड कोहेन का एक कोट याद आया था, जो लोकतंत्र के खतरे और उसके बावजूद उम्मीद की बात करता है। उनके मुताबिक कुछ फैसले सीधे-सपाट होते हैं, जबकि कुछ में सोच और संवेदनशीलता का ‘फ्लोरिश’ जरूरी होता है। उमर खालिद के मामले पर सवाल पूछे जाने पर पूर्व CJI ने स्पष्ट किया कि वह अब जज के रूप में नहीं, बल्कि एक नागरिक के तौर पर बोल रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय कानून की बुनियाद ‘निर्दोषता की पूर्वधारणा’ पर टिकी है। हर आरोपी तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक ट्रायल में दोष सिद्ध न हो जाए। प्री-ट्रायल बेल किसी भी तरह से सजा नहीं हो सकती। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर कोई व्यक्ति 5 से 7 साल तक अंडरट्रायल कैदी के रूप में जेल में रहे और बाद में बरी हो जाए, तो उस खोए हुए समय की भरपाई कैसे होगी। चंद्रचूड़ ने जमानत न देने के मामलों को उदाहरण से समझाते हुए कहा कि यदि आरोपी सीरियल रेपिस्ट या मर्डरर हो और उसके बाहर आने से समाज को गंभीर खतरा हो, या वह फरार हो सकता हो, या सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका हो तो ऐसे मामलों में बेल से इनकार किया जा सकता है। लेकिन यदि ये तीनों परिस्थितियां नहीं हैं, तो बेल नियम होनी चाहिए। उन्होंने चिंता जताई कि नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े कानून कई बार ‘इननोसेंस’ की जगह गिल्ट को प्राथमिकता देने लगते हैं। अदालतों को यह जांचना चाहिए कि क्या वाकई राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है और क्या हिरासत जरूरी और अनुपातिक है। वरना लोग सालों तक जेल में सड़ते रहते हैं। उन्होंने कहा कि अगर ट्रायल उचित समय में पूरा नहीं होता, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्पीडी ट्रायल के अधिकार का उल्लंघन है। संविधान सर्वोच्च है, इसलिए एक्सेप्शन न हों तो बेल मिलनी चाहिए। चंद्रचूड़ ने यह भी कहा कि उमर खालिद को जेल में करीब पांच साल हो चुके हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि अपनी ही संस्था की आलोचना करना उनके लिए आसान नहीं है, क्योंकि एक साल पहले तक वह सुप्रीम कोर्ट का नेतृत्व कर रहे थे। लेकिन सिद्धांत यही कहते हैं कि शर्तें लगाई जा सकती हैं, पर अगर ट्रायल आगे नहीं बढ़ पा रहा है, तो बेल पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। उन्होंने हाईकोर्ट और जिला अदालतों में बेल न देने की प्रवृत्ति को चिंताजनक बताया। उनके अनुसार जिला अदालतें न्याय प्रणाली का पहला इंटरफेस होती हैं, लेकिन वहां एक डर का माहौल है। जज सोचते हैं कि बेल देने पर उनके इरादों पर सवाल उठेंगे या उनकी ईमानदारी पर शक किया जाएगा। इसका नतीजा यह है कि अधिकतर मामलों को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक धकेल दिया जाता है, जिससे सुप्रीम कोर्ट पर हर साल करीब 70 हजार केसों का बोझ बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि यदि कोई जिला जज गलत तरीके से बेल दे देता है, तो उसे उच्च अदालत में पलटा जा सकता है, लेकिन जजों पर नैतिक दबाव नहीं बनाना चाहिए। हाईकोर्ट की छोटी-सी टिप्पणी भी ट्रायल जज के करियर और प्रमोशन को नुकसान पहुंचा सकती है, जिससे जज डर के माहौल में काम करने लगते हैं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चंद्रचूड़ ने साफ किया कि वह इसे सही नहीं ठहरा रहे, लेकिन जज भी समाज से ही आते हैं और समाज में भ्रष्टाचार मौजूद है। हालांकि जजों से उच्च नैतिक स्तर की अपेक्षा की जाती है। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार को रोकने के लिए प्रभावी जवाबदेही व्यवस्था जरूरी है। हर गलत फैसले को भ्रष्टाचार से जोड़ देना आसान है, लेकिन सच्चाई को समझना और सिस्टम को मजबूत करना ज्यादा जरूरी है।

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