प्रदेश में हर दिन अलग-अलग तरह के 25 लाख से अधिक इंजेक्शन (एम्पुल और वायल) बनाएं जाते हैं, लेकिन उनकी जांच के लिए एक भी सरकारी माइक्रोबायोलॉजी टेस्टिंग लैब नहीं है। यहां बने इंजेक्शन जांच के लिए अन्य प्रदेशों में सेंट्रल ड्रग टेस्टिंग लैब (सीडीटीएल) भेजे जाते हैं। यहां लैब नहीं होने से इंजेक्शन की टेस्टिंग रिपोर्ट आने में काफी समय लगता है। दवाओं में बैक्टेरिया या फंगस जांचने वाली सरकारी स्टेरिलिटी लैब भी मप्र में नहीं है। सरकार की भोपाल टेस्टिंग लैब में दवाओं की जांच करने वाले कुछ केमिकल्स की कमी है। प्रदेश की 200 से अधिक दवा कंपनियों की लाइसेंसिंग, उत्पादन सहित अन्य मॉनिटरिंग के निर्धारित स्टेट ड्रग लाइसेंसिंग अथॉरिटी के चार पदों में से तीन खाली हैं। एक अफसर के जरिये ही पूरे प्रदेश पर नजर रखी जा रही है। भोपाल के अलावा हाई कोर्ट के आदेश पर कुछ समय पहले इंदौर और जबलपुर में फूड एंड ड्रग टेस्टिंग लैब तो शुरू कर दी गई है, लेकिन दोनों लैब को फिलहाल जांच के लिए दवाओं के सैंपल लेने के अधिकार नहीं है। अलग-अलग जिलों से दवाओं के सैंपल पहले भोपाल पहुंचते हैं और वहां से इंदौर-जबलपुर भेजे जाते हैं, इस प्रक्रिया में ज्यादा समय लगने लगता है और रिपोर्ट देर से मिलती है। जबलपुर-इंदौर की लैब में टेस्ट के लिए लगने वाला केमिकल भी भोपाल से ही भेजा जा रहा है। अथॉरिटी के चार पद इनमें से तीन खाली
दवा कंपनियों के उत्पादन सहित नियमों के पालन के लिए विभाग में स्टेट ड्रग लाइसेंसिंग अथॉरिटी के मप्र में चार पद हैं, लेकिन लंबे समय से इनमें से तीन पद खाली हैं। डिप्टी ड्रग कंट्रोलर शोभित कोष्टा ही चारों पदों का काम देख रहे हैं। इसी कारण जहरीला कफ सिरप फैक्ट्री में बनकर मेडिकल तक पहुंच गया।
लैब में 15 की जरूरत, काम कर रहे पांच
इंदौर, भोपाल और जबलपुर की ड्रग टेस्टिंग लैब में कर्मचारियों की भी कमी है। तीनों लैब में सिर्फ एक-एक एनालिस्ट ही है। इंदौर की एनालिस्ट पूनम इसरानी ने बताया, उनके सहित 5 लोग जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। जबकि एक लैब में कम से कम 15 लोगों की जरूरत होती है। भोपाल में अजय अत्रे और जबलपुर में अनिल मर्सकोले मुख्य एनालिस्ट हैं।
मप्र में हर दिन बन रहे 25 लाख इंजेक्शन
प्रदेश में 200 छोटी-बड़ी दवा कंपनियां संचालित होती हैं। सबसे अधिक इंदौर और पीथमपुर में हैं। प्रदेश में हर दिन अलग-अलग कंपनियां 25 लाख से अधिक इंजेक्शन (वायल और एम्पुल) बनाती हैं। सरकारी माइक्रोबायोलॉजी लैब नहीं होने से निजी लैब या अन्य प्रदेशों में सेंट्रल ड्रग टेस्टिंग लैब के भरोसे रहना होता है, जिससे जांच रिपोर्ट लेट आती हो जाती हैं।
– डॉ. दर्शन कटारिया, अध्यक्ष, मप्र स्मॉल ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन


