गुरमीत लूथरा | अमृतसर सरकार के प्रयासों के चलते अब अमीरों के बच्चे भी प्राइवेट स्कूलों से छोड़ सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने लगे हैं। सरकारी स्कूलों में बच्चों को शिक्षा दिलाने का रुझान बढ़ा है। शिक्षा के उच्च स्तर एवं मिड डे मिल, स्कॉलरशिप, फ्री वर्दी जैसी सुविधाओं के नतीजन परिजन अब बच्चों को सरकारी स्कूलों में शिक्षा देने पर गंभीर मथन कर रहे हैं। जी हां… शनिवार को मेगा पेरेंट्स-टीचर मीट से तो ऐसा ही प्रतीत हो रहा है। भास्कर टीम 2 स्कूलों का पहुंची जहां यह बात देखने को मिली। स्कूल ऑफ एमिनेंस करमपुरा की 11वीं की स्टूडेंट पूजा ने बताया कि उन्हें स्कॉलरशिप भी मिल रही है। स्कॉलरशिप के रूप में वह 2 साल में 74 हजार रुपए हासिल कर चुकी हैं। साइंस-कॉमर्स सब्जेक्ट की कोचिंग ही बाहर से परिजनों को करवानी पड़े तो 2 लाख सालाना तो अकेडमी प्रबंधक ही ले लेते हैं, जबकि यहां 11वीं कक्षा तक शिक्षा फ्री है चाहे साइंस स्ट्रीम या कॉमर्स। वहीं स्टूडेंट राजविंदर सिंह की माता बलजीत कौर ने बताया कि बेटे को स्कॉलरशिप मिलनी शुरू हो गई है। यहां बच्चों को टीचर स्टूडेंट फ्रैडली माहौल मिलता है, जब चाहे बच्चे टीचर से किसी भी समस्या के समाधान के लिए सीधे संपर्क कर सकते हैं। इससे शिक्षा में आसानी हो रही है। सरकारी प्राइमरी एलिमेंटरी स्कूल गुमटाला की दूसरी कक्षा की स्टूडेंट कशिश के पिता मंगा ने बताया कि पहले प्राइवेट स्कूल में ही दाखिल करवाया था जहां एडमिशन के लिए ही 3500 रुपए देने पड़े थे। मंगा ने कहा कि सरकारी स्कूल में उन्हें कोई फीस नहीं देनी पड़ी, बल्कि स्कूल प्रबंधन की ओर मिड डे मील के तहत बच्चों को भोजन-फ्रूट भी दिया जा रहा है। वर्दी भी स्कूल की ओर से दी जाती है। इसलिए उनकी इच्छा 8वीं तक बेटी को इसी स्कूल में ही शिक्षा दिलाने की है। कशिश ने कहा कि उसका सपना डॉक्टर बनना है, जो सरकार तथा टीचरों के प्रयासों से ही संभव हो सकती है। स्कूल ऑफ एमिनेंस करमपुरा में पीटीएम में पहुंचे बहिंदर सिंह ने बताया कि दुबई में जॉब करते हैं। उनकी सैलरी 80 हजार रुपए है मगर इसके बावजूद यहां क्वालिटी एजुकेशन तथा बेहतरीन माहौल होने के चलते बेटे प्रभजोत को इसी स्कूल में शिक्षा दिला रहे हैं। बहिंदर सिंह ने कहा कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्टेंडर इतना बढ़ गया है कि अब स्कूलों में करिअर कंसल्टेंट भी तैनात हैं। बेटा परीक्षा में 88-90 प्रतिशत अंक हासिल कर रहा है उन्हें भला और क्या चाहिए, जबकि प्राइवेट स्कूलों में इस तरह मार्गदर्शन हासिल ही नहीं होता है।


