बंटवारे के दर्द को शब्दों में ढालती नायाब मिड्ढा:कहा- मारने वाले भी मुस्लिम थे, बचाने वाले भी मुस्लिम; पड़ोसियों ने मेरी दादी को इंडिया भेजा

पाकिस्तान से बंटवारे के समय एक औरत का सब कुछ पीछे छूट जाना, आंखों के सामने परिवार का कत्ल और फिर जिंदगी भर साथ रहने वाला बिछड़ने का दर्द, यही वो कहानी है, जो आज स्टोरीटेलर और पोएट नायाब मिड्ढा की आवाज में शब्द बनकर सामने आती है। नायाब की दादी ने बंटवारे का यह दर्द जिया था और वही अधूरी रह गई भावनाएं आज उनकी कविताओं और स्टोरीटेलिंग का आधार हैं। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में नायाब मिड्ढा ने अपनी स्टोरीटेलिंग जर्नी, लिखने के पीछे की फीलिंग्स, पुरुषों के दर्द पर लिखने की वजह, बॉर्डर की लकीरों को लेकर अपनी असहमति, धर्म और इंसानियत पर सोच और यूथ में बढ़ते स्टोरीटेलिंग व कॉमेडी के क्रेज जैसे कई मुद्दों पर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि कैसे स्कूल की एक छोटी डायरी से लिखना शुरू हुआ और आज बड़े मंचों तक पहुंचा है और कैसे लिखना उनके लिए सिर्फ परफॉर्मेंस नहीं, बल्कि अपने और पिछली पीढ़ियों के दर्द को एक्सप्रेस करने का तरीका है। सवाल: आपने स्टोरीटेलिंग की शुरुआत कहां से की और कैसे लोगों के दिलों तक पहुंचती हैं? जवाब: लोगों के दिलों तक पहुंचना लोगों की मेहरबानी है, इसमें मेरा कुछ नहीं है। लोग हमारी बातों को सुनते हैं और उन्हें अपने दिल में जगह दे देते हैं। हमारी कोशिश भी यही रहती है कि हम अच्छी बातें करें और बेहतर तरीके से कह सकें।
मेरी इस जर्नी की शुरुआत स्कूल की एक छोटी सी डायरी से हुई थी, जो आज बहुत बड़े-बड़े मंचों तक पहुंच चुकी है। इसकी खुशी मुझे दो तरफा लगती है। सवाल: पोएट्री के लिए फीलिंग्स कैसे आती हैं, परफॉर्मेंस के दौरान या पहले से तय रहती हैं? जवाब: मुझे लगता है कि दुनिया में अलग-अलग तरह के लोग होते हैं। उनमें एक तरह के लोग ऐसे होते हैं जो हर चीज को दस गुना ज्यादा महसूस करते हैं। जो लोग ज्यादा महसूस करते हैं, वे अक्सर अपनी भावनाओं और ओवर थिंकिंग की दलदल में फंसे रहते हैं। उससे निकलने का सबसे आसान तरीका है कि आप लिख लें, एक्सप्रेस कर लें। मैंने भी वहीं से शुरुआत की थी। मुझे कुछ एक्सप्रेस करना था, बस हल्का होना चाहती थी, क्योंकि ज्यादा सोचने से दिल भारी हो जाता है।
जब मैंने उसे कागज पर उतारा और लोगों को सुनाया, तो एक कॉमन ग्राउंड बना कि ये तो तुम भी महसूस करते हो, हम भी करते हैं। आओ इसे कह लेते हैं। मैंने अपनी ही फीलिंग्स को एक्सप्रेस किया है। हम ह्यूमन कोर लेवल पर काफी हद तक एक जैसे होते हैं, बस हम यह बात भूल जाते हैं। सवाल: आपकी कविताओं में पुरुषों के दर्द का भी जिक्र होता है? जवाब: जब आप किसी से प्रेम करते हैं, किसी के दर्द को महसूस करते हैं, तो वो भावनाएं आपके अंदर भी आती हैं और बाहर निकलती हैं। ऐसा कोई पर्टिकुलर इंटेंशन नहीं होता कि पुरुषों की बात करें या औरतों की। हम तो बस बात करना चाहते हैं। सवाल: आपकी दादी पाकिस्तान से बंटवारे के समय भारत आई थीं? जवाब: जी बिल्कुल। बंटवारे के समय वे पाकिस्तान की चिश्तिया मंडी नाम की जगह पर रहती थीं। जब बंटवारा हुआ तो वे हिंदू थीं, इसलिए उन्हें इस तरफ आना पड़ा। उनकी जिंदगी बहुत ट्रॉमेटाइजिंग (मानसिक रूप से परेशान) रहीं।
वे बताती थीं कि उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने भाइयों को कटते हुए देखा। यह कितनी अजीब बात है कि मारने वाले भी मुसलमान थे और बचाने वाले भी मुसलमान। मेरी दादी के पड़ोसी मुस्लिम थे, जिन्होंने उन्हें बचाकर इंडिया भेजा। मुझे लगता था कि एक औरत, जो अपने पूरे परिवार से दूर आकर यहां बैठी है, कभी दोबारा अपनों से बात नहीं हो पाई। उनके अंदर बिछुड़ने का गहरा दुख था, लेकिन वे अपनी फीलिंग्स एक्सप्रेस नहीं कर पाती थीं। फिर वही चीज मेरे पापा में आई कि एक्सप्रेस करना मुश्किल लगता था और फिर मैं आई, जिसे एक्सप्रेस करने के अलावा कुछ आता ही नहीं। मुझे लगता है कि मैं उन दोनों के हिस्से का दर्द एक साथ एक्सप्रेस कर देती हूं। सवाल: क्या आप कभी पाकिस्तान गई हैं या जाना चाहेंगी? जवाब: नहीं, कभी नहीं गई। लेकिन मैं अपनी दादी की उस जगह पर जाना चाहती हूं, जहां से वे थीं। सवाल: राजस्थान और पाकिस्तान के कनेक्शन को आप कैसे देखती हैं? जवाब: मैं खुद को बॉर्डर का प्रोडक्ट मानती हूं। मैं इनमें कोई कनेक्शन देखना ही नहीं चाहती, मैं तो कोई लकीरें ही नहीं देखना चाहती। मेरी एक कविता है ‘लकीरें’। मुझे बॉर्डर का कॉन्सेप्ट पसंद नहीं है, खासकर जब हम बॉर्डर से जुड़े फैक्ट्स देखते हैं। सवाल: आपके हिसाब से धर्म कौन सा बड़ा होना चाहिए? जवाब: इंसानियत और दयालुता। सभी धर्म एक ही बात सिखाते हैं कि जब हम सब आए थे, तब हमें यही बताया गया था कि जिंदगी कैसे जीनी है। सवाल: यूथ में स्टोरीटेलिंग और कॉमेडी का क्रेज बढ़ रहा है, इसे कैसे देखती हैं? जवाब: जैसे-जैसे दुनिया आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे भाषा और एक्सप्रेशन के फॉर्मेट बदलते हैं। पहले भी एक जैसा फॉर्मेट नहीं था। चेंज ही इकलौता कॉन्स्टेंट है।
दुनिया बदलती है तो दुनिया को एक्सप्रेस करने के तरीके बदलते हैं, जोक्स बदलते हैं। कोर वही रहता है, बस तरीके बदल जाते हैं। तब भी बातें थीं, आज भी बातें हैं।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *