बड़वानी में फरवरी में 31 डिग्री पहुंचा अधिकतम तापमान:किसान बोले- चने की फसल मौसम बदलाव से हटानी पड़ी, 16 हजार का हुआ नुकसान

बड़वानी में फरवरी में दिन का तापमान 30-32 डिग्री और रात का पारा 10-13 डिग्री सेल्सियस के बीच बना हुआ है। कृषि विज्ञान केंद्र के आंकड़ों के मुताबिक बुधवार को अधिकतम तापमान 31 डिग्री और न्यूनतम 13 डिग्री दर्ज किया गया। इस असामान्य गर्मी का सबसे ज्यादा असर चने की फसल पर देखा जा रहा है। फसल में वायरस और अफलन की समस्या पैदा हो गई है, जिससे फसल का रंग हरा-भरा होने की बजाय पीला पड़ने लगा है। समय से पहले ही पकने की स्थिति में पहुंच गई है। किसान बोले- गर्म मौसम से फसल उत्पादन प्रभावित अंजड़ के किसान देवेंद्र यादव ने बताया कि मेरी तीन एकड़ में लगी चने की फसल मौसम बदलाव से इतनी प्रभावित हुई कि 15-16 हजार रुपए की लागत के बावजूद रोटावेटर चलाकर फसल को खेत से हटाना पड़ा। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इस समय फसलों को ठंडे मौसम की है, लेकिन फरवरी में ही गर्मी पड़ने लगी है। लोगों को गर्मी से राहत पाने के लिए पंखों का सहारा लेना पड़ रहा है। अगर यही हालत रही तो फसल उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है। चने की फसल हटाकर खरबूजा लगाया ग्राम चकेरी के किसान गोपाल सीताराम पाटीदार ने बताया कि चार एकड़ खेत में चने की बोवनी की थी। कुछ ही दिन फसल में बढ़वार दिखी, बाद में गर्म मौसम से फसल प्रभावित होकर अफलन की स्थिति बनने लगी थी। आखिर में खेत को साफ करवाकर खरबूजा लगाना पड़ा है। जिन किसानों के यहां गेहूं-चना लगा है, उसको भी ठंडे मौसम की जरूरत है। गर्मी से चने में उकठा वायरस का खतरा कृषि विज्ञान केंद्र के रवींद्र सिंह सिकरवार का कहना है कि केंद्र पर बीते साल के दर्ज आंकड़ों के मुताबिक जनवरी-फरवरी में इस बार दिन-रात का तापमान रिकार्ड दर्ज हुआ है। हर दिन तापमान बढ़ रहा है। फिलहाल वातावरण में ठंड के कोई आसार नहीं बन रहे है। ऐसी स्थिति में गेहूं समय से पहले पकने की और चने में उकठा वायरस का अंदेशा बढ़ता है। फसल पर कीट का प्रकोप होता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे बीड कहते है। मृदा-बीज जनित बीमारी है उकठा मौसम विशेषज्ञ सिकरवार ने बताया कि उकठा फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम नामक फफूंद के कारण होता है। यह मृदा और बीज जनित बीमारी है। यह रोग पौधे में फली लगने तक किसी भी अवस्था में हो सकता है। वहीं चने की बार-बार बुआई से भी यह समस्या आती है। किसानों ने फसल चक्र का पालन करना चाहिए। यानी बदल-बदल कर फसल लगानी चाहिए। फसलों का इस तरह कर सकते है बचाव कृषि विज्ञान केंद्र के रवींद्र सिंह ने कहा कि फसलों के बचाव के लिए प्रतिरोधी किस्में का चयन करें। इसके नियंत्रण के लिए ट्राइकोडर्मा पाउडर 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें। साथ ही चार किलोग्राम ट्राइकोडर्मा को 100 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर की खाद मे मिलाकर बुवाई से पहले प्रति हेक्टयेर की दर से खेत मे मिलाएं। खड़ी फसल मे रोग के लक्षण दिखाई देने पर कार्बेंडाजिम 50 डब्ल्यू पी 0.2 प्रतिशत घोल का पौधों के जड़ क्षेत्र मे छिड़काव पर्याप्त नमी होने पर करें।

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