राजस्थान के अजमेर-केकड़ी जिलों के 13 गांवों में हर दूसरे घर की बेटी फुटबॉल खेलती है। यहां 550 लड़कियां फुटबॉलर हैं। 245 बेटियां अपने बाल विवाह के खिलाफ खड़ी हुईं। कई ने खेलने के लिए सगाई तोड़ दी। 6 बेटियां डी-लाइसेंस हासिल कर कोच बन गई हैं। 15 लड़कियां नेशनल टूर्नामेंट खेल चुकी हैं। इस बदलाव की बड़ी सूत्रधार रही हैं महिला जन अधिकार समिति की डायरेक्टर इंदिरा पंचौली और समन्वयक पद्मा। पंचौली ने बताया कि वे बाल विवाह रोकने के अभियान के तहत बंगाल गई तो देखा कि गांव की बच्चियां स्कूल के बाद थानों में बने मैदानों में फुटबॉल खेल रही हैं। वे स्कूल बैग में कपड़े लेकर आती हैं। फिर हमने ठाना कि अपने जिले अजमेर में भी बदलाव लाएंगे। इसके लिए गांवों में खेल उत्सव लगाए। घोषणा करवाई कि जो बेटियां फुटबॉल खेलना चाहती हैं, वे आएं। काफी लड़कियां आईं, पर जब प्रैक्टिस और प्रतियोगिताओं के लिए बाहर जाने की बात आई तो घर वालों ने ही रोक दिया। शेष | पेज 11 बेटियों पर बनी है डॉक्यूमेंट्री… किकिंग बॉल्स निर्माता अश्विनी यार्डी और ऑस्कर विजेता गुनीत मोंगा कपूर की हाल में 40 मिनट की डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘किकिंग बॉल्स’ प्रसार भारती पर रिलीज हुई। इसमें केकड़ी की बेटियों का संघर्ष दिखाया गया है। इसे न्यूयॉर्क फिल्म फेस्टिवल सहित 7 पुरस्कार और ऑफिशियल सिलेक्शन मिल चुके हैं। संघर्ष के ये 3 बड़े पड़ाव, जिन्हें बेटियों ने किया पार 1. चाचियावास गांव में सरकारी स्कूल में फुटबॉल नहीं खेलने दिया गया, बेटियों ने खेत में प्रैक्टिस की। अब मेयो समेत कई बड़े स्कूल प्रैक्टिस के लिए अपने मैदान देते हैं। 2. फुटबॉल केवल लड़कों का ही खेल है। इस विचार को तोड़ने के लिए बेटियों ने दिन-रात मेहनत की। अब इन 13 गांवों में बेटियों को देख लड़के भी फुटबॉल खेलते हैं। 3. कई बेटियों के जीवन में यह भी क्षण आया, जब उन्हें अपने बचपन की शादी के बंधन में मिले पति या फुटबॉल में से एक को चुनना पड़ा। मगर सभी ने पहले फुटबॉल चुना। नेशनल और स्टेट प्लेयर बनीं।


