बसंत में मनता है फूलों का त्योहार:सरहुल के दिन होता है सूर्य और धरती का विवाह

डॉ. हरि उरांव, पूर्व समन्वयक, टीआरएल, आरयू रांची | सरहुल हिंदी पंचांग के चैत्र महीने के तीसरे दिन मनाया जाता है। यह उत्सव भारत में आदिवासियों की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत व ऐतिहासिक परंपराओं का प्रतिबिंब है। हो और मुंडा जनजातियों में सरहुल को बा पर्व के रूप में जाना जाता है, बा जिसका अर्थ होता है फूल और पर्व यानी की त्योहार। संथाली में सरहुल को बाहा पर्व के नाम से जानते हैं, बाहा जिसका अर्थ होता है फूल यानी फूलों का त्योहार। खड़िया जनजाति में सरहुल को जंकोर के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ होता है, सृजन या अंकुरण। उरांव जनजातियों में सरहुल पर्व को खद्दी के नाम से जानते हैं। खद्दी यानी खुद्द अर्थात शिशु। शिशु को नव अंकुर भी कहा जा सकता है। पवित्र परंपरा परिणय सूत्र में बंधने के बाद नव दंपति से वंश परंपरा को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया आरंभ होती है। वास्तव में सरहुल का पर्व सृष्टि की रचना का प्रतीकात्मक रूप है। यही वह समय है जब जंगल में साल के फूल खिलते हैं। पलाश के लाल चटक रंग से जंगल दहक उठता है। महुआ के फूलों की मादकता से पूरा जंगल महकने लगता है। गेंहू, सरसों और रबी के फसल पक कर खलिहानों तक पहुंचने लगते हैं। अच्छी फसल की आमद से किसान और खेतिहर का मन आह्लादित हो उठता है। चारों ओर खुशियां ही खुशियां होती हैं, प्रकृति के रचयिता सूर्य, पृथ्वी, पहाड़, वायु, अग्नि, जल, जंगल व ईश्वर के प्रतीकों के प्रति आदर के भाव होते हैं। उरांव जनजाति की मान्यताओं के अनुसार सरहुल के दिन ही प्रतीकात्मक तौर पर सूर्य व धरती का विवाह कराया जाता है। पाहन को सूर्य के प्रतीक रूप में देखा जाता है व इसी परंपरा के निर्वहन के लिए सूर्य के प्रतीक पाहन व पृथ्वी की शादी कराई जाती है। इस दिन पाहन को दूल्हे की तरह कंधे पर बिठाकर स्नान कराया जाता है और कुंवारी कन्या पृथ्वी के साथ शादी की नेग व रस्मों को पूरा कराया जाता है। शादी के बाद ही कुंवारी कन्या एक विवाहित स्त्री के रूप परिणत होती है और सृष्टि को चलाने के लिए वंश परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए शिशु को जन्म देती है। मान्यताओं के अनुसार सरहुल पर्व के पूर्व तक प्रकृति प्रदत्त नए अन्न, फलों और फूलों का सेवन वर्जित है। सरहुल के दिन प्रकृति को धन्यवाद अर्पित करने के बाद ही उनका सेवन आरंभ किया जाता है। उरांव जनजातियों में चैत्र और पूष माह में विवाह भी वर्जित है। यह त्योहार अपने देवी-देवताओं, इष्ट, विशिष्ट और शक्तियों को नमन करने का दिन है।

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