कांग्रेस सरकार के समय बने नए जिलों में से 9 जिलों और 3 संभागों को भजनलाल सरकार ने खत्म करने का फैसला लिया है। साथ ही पाली, सीकर, बांसवाड़ा संभाग भी खत्म कर दिए गए हैं। राज्य सरकार के निर्णय के बाद राजस्थान में 50 जिलों की संख्या घटकर 41 रह जाएगी। जबकि 10 संभाग की जगह 7 संभाग ही अस्तित्व में रहेंगे। भजनलाल सरकार के इस फैसले को लेकर बांसवाड़ा में नाराजगी भी देखने को मिली। क्योंकि निर्णय के बाद स्थानीय जनजाति लोगों को और सरकारी कार्मिकों को संभाग स्तर के काम के लिए उदयपुर तक करीब 165 से 210 किमी तक का सफर तय करना पड़ेगा। गत कांग्रेस सरकार ने बांसवाड़ा संभाग में बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ जोड़ा था। इनकी बांसवाड़ा संभाग मुख्यालय से दूरी महज 80 से 100 किमी तक ही है। ऐसे में कम दूरी की वजह से तीनों जिलों की मॉनिटरिंग भी प्रभावी हो रही थी। पूर्व संभागीय आयुक्त नीरज के पवन भी हर सप्ताह डूंगरपुर और प्रतापगढ़ जिलों का दौरा कर रहे थे। साथ ही वहां कई विकास कार्यों के अलावा लोगों की समस्या को लेकर समाधान भी कर रहे थे। लेकिन इस निर्णय के बाद अब समस्याओं के समाधान के लिए 200 किलोमीटर दूर उदयपुर तक जाना पड़ सकता है। विधायक बामनिया बोले- भाजपा सरकार जनविरोधी
सरकार के फैसले के बाद बांसवाड़ा विधायक अर्जुनसिंह बामनिया ने कहा- पिछली सरकार ने यह देख कर घोषणा की थी कि बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ आदिवासी बहुल क्षेत्र हैं। बांसवाड़ा संभाग बनने से इन जिलों को विकास की नई दिशा मिलेगी। संभाग स्तर के कार्यालय बांसवाड़ा आने से जनजाति लोगों के काम और समस्या का जल्द निराकरण होता था। लेकिन यह सरकार जनजाति समुदाय की विरोधी है। कांग्रेस बांसवाड़ा को संभाग बनाए रखने की मांग करेगी और भाजपा सरकार के निर्णय के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी करेंगे। एकमात्र ट्राइबल संभाग था, 45 लाख से अधिक की आबादी
गहलोत सरकार के निर्णय के बाद बांसवाड़ा संभाग राजस्थान में एकमात्र ट्राइबल संभाग था, जिसे 25 तहसीलों और 1005 ग्राम पंचायतों को मिलाकर बनाया था। इसकी आबादी करीब 45 लाख से अधिक है। इसमें बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ जिलों को पूर्ण रूप से सम्मिलित किया था। राजनीतिक दृष्टि से भी तीनों जिलों की सभी 11 विधानसभा सीटें भी आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित है। विकास की संभावनाएं कमजोर हुई
स्थानीय लोगों का कहना है- बांसवाड़ा के संभाग बनने से शिक्षा, औद्योगिक विकास, स्वास्थ्य, इंफ्रास्टक्चर, पर्यटन, रियल एस्टेट, इको टूरिज्म आदि क्षेत्रों में विकास की उम्मीदें बढ़ी थीं। संभाग के अनुरूप राज्य से बजट मिलने की संभावनाएं भी थी। बांसवाड़ा नगर परिषद के भी क्रमोन्नत होकर नगर निगम बनने या नगर विकास प्रन्यास की स्थापना की संभावनाएं थी, जो अब राज्य सरकार के इस निर्णय के बाद कमजोर हो गई हैं। सरकार ने पहले ही दे दिए थे संकेत
बांसवाड़ा को संभाग बनाने के बाद पहले आयुक्त का अतिरिक्त कार्यभार उदयपुर के तत्कालीन संभागीय आयुक्त राजेंद्र भट्ट को दिया था। इसके बाद यहां नीरज के. पवन की नियुक्ति हुई। पवन के स्थानांतरण के बाद आयुक्त का चार्ज उदयपुर संभागीय आयुक्त को दिया था। वहीं अतिरिक्त संभागीय आयुक्त का भी तबादला कर दिया था। इस दौरान नई नियुक्ति नहीं होने और रिव्यू कमेटी की रिपोर्ट आने के चलते यह संकेत मिल गए थे कि तीन ही जिले होने से सरकार संभाग का दर्जा हटा सकती है। हालांकि वर्तमान में यहां आईजी पुलिस का कार्यालय संचालित है। अब नए पदों पर लग सकता है अंकुश
संभाग का दर्जा खत्म करने से बांसवाड़ा में जनजाति विकास विभाग आयुक्तालय, संयुक्त निदेशक शिक्षा, चिकित्सा, अतिरिक्त मुख्य अभियंता जन स्वास्थ्य और अभियांत्रिकी, आरटीओ, उप निदेशक पर्यटन, रीको में उप महाप्रबंधक जैसे कार्यालय खुलने और नए पदों का सृजन होने की संभावनाएं क्षीण हो गई हैं। वहीं अब प्रशासनिक कार्यों के लिए पहले की भांति उदयपुर तक की दौड़ फिर शुरू हो जाएगी।


