यह कोई ज्वालामुखी पर्वत से निकलने वाला लावा नहीं है, बल्कि चिरमिरी की एसईसीएल ओपन कोस्ट कोयला खदान है। इसे एशिया की फायर माइंस का दर्जा मिला है, जहां 24 घंटे आग के बीच कोयले का उत्पादन होता है। यहां हर दिन 3.5 हजार टन कोयला निकाला जाता है, जिससे देश की ऊर्जा जरूरतें पूरी होती हैं। पांच दशक पहले यहां अंडरग्राउंड माइंस में आग लगने से उत्पादन बंद हुआ था, लेकिन अब ओपन कास्ट से काम जारी है। यहां करीब 626 श्रमिक तीन शिफ्टों में काम करते हैं। बारिश में चुनौतियां बढ़ जाती हैं, फिर भी पहली बार घाटे में चल रही खदान ने इस साल दो करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया है। पांच दशक पहले यहां अंडर ग्राउंड माइंस के माध्यम से कोयला निकाला जा रहा था। माइंस में आग लगने पर कोयले का उत्पादन बंद कर दिया था। अब बीते एक दशक से ओपन कास्ट माइंस के माध्यम से कोयला निकाला जा रहा है। भास्कर एक्सपर्ट – डॉ. केतन चौरसिया, माइंनिंग एक्सपर्ट कोयला खदानों में बारिश का असर उल्टा, आग भड़कती है आमतौर पर माना जाता है कि बारिश से आग बुझती है, लेकिन कोयला खदानों के मामलों में यह उल्टा होता दिखाई पड़ता है। दरअसल, जब बारिश का पानी कोयले की परतों में रिसता है, तो यह कुछ रासायनिक और भौतिक क्रियाओं को तेज कर देता है। गीला कोयला ऑक्सीजन के संपर्क में आने पर अधिक तेजी से ऑक्सीकृत होता है, जिससे गर्मी पैदा होती है। जब यह गर्मी एक सीमित क्षेत्र में जमा हो जाती है, तो वह स्वत: दहन (self-ignition) का कारण बन जाती है।


