भास्कर न्यूज | अमृतसर पंजाब प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के रिकॉर्ड में सामने आया है कि अमृतसर के 931 अस्पतालों में से 104 अस्पताल बिना पॉल्यूशन एनओसी के चल रहे हैं। ये अस्पताल पिछले एक साल से लेकर 11 साल तक बिना एनओसी के काम कर रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि इनमें 28 अस्पताल सरकारी हैं। इन सरकारी अस्पतालों में गुरु नानक देव अस्पताल, ईएनटी अस्पताल, टीबी अस्पताल और सेंट्रल जेल फताहपुर भी शामिल हैं। यानी इलाज के नाम पर पर्यावरण की सेहत से भी खिलवाड़ हो रहा है। यदि अस्पताल वायु-जल प्रदूषण के बायोमेडिकल वेस्ट नियमों का पालना नहीं करने पर जुर्माना एवं बैंक गांरटी व अपनी कंसर्न का लाइसेंस रद्द कर सकता है। इसके अलावा समझाने पर भी नहीं मानने की स्थिति में अस्पताल को बंद भी कराने का अधिकार है। अस्पताल के कचरे में बैक्टीरिया, वायरस और अन्य रोगजनकों से दूषित सामग्री होती है, जो रोगियों, लोगों को संक्रमित कर सकती है। ^सिविल सर्जन डा. किरन अरोड़ा ने बताया कि विभाग का एनवायरो केअर नामक कंपनी के साथ अनुबंध है, जो सरकारी अस्पतालों के अलावा निजी अस्पतालों का बाओ मेडिकल पॉल्यूशन के सैंपल लेती है और रिपोर्ट देती है। ^ जिन अस्पतालों ने बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2016 के तहत ऑथराइजेशन नहीं लिया या रिन्यू नहीं कराया, उन्हें समय-समय पर नोटिस भेजे जाते हैं। पीपीसीबी के पास यह अधिकार है कि वह ऐसे अस्पतालों पर जुर्माना लगा सकता है, बैंक गारंटी जब्त कर सकता है। अस्पताल बंद करवाने की कार्रवाई भी की जा सकती है। जिसके लिए भी प्रयास कर रहे हैं। -सुखदेव सिंह, एक्सईएन, रीजनल, पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड एनओसी अस्पताल के कचरे में बैक्टीरिया, वायरस और अन्य रोगजनकों से दूषित सामग्री होती है, जो रोगियों, लोगों को संक्रमित कर सकती है। दवा प्रतिरोधी सूक्ष्मजीव भी होते हैं, जो पर्यावरण में फैलकर संक्रमणों को और भी गंभीर बना सकते हैं। कचरे को जलाने से बड़ी मात्रा में डाइऑक्सिन, पारा और अन्य प्रदूषक उत्पन्न होते हैं जो हवा में मिल जाते हैं। पानी और लैंडफिल में डंप से जमीन हो सकती है। सरकार द्वारा तय एनओसी फीस मामूली है, बावजूद इसके कई अस्पताल इसे गंभीरता से नहीं ले रहे। जीरो बेड वाले अस्पतालों को एक बार 1,000 रुपए फीस देनी होती है, जबकि 1 से 10 बेड वालों के लिए यह फीस सालाना 1,000 रुपए है। 51 से 100 बेड वाले अस्पतालों को 5,000 रुपए है। इसके बावजूद, न तो निजी और न ही सरकारी अस्पताल इसे जरूरी मानते हैं। 76 ऐसे निजी अस्पताल हैं जिनमें से कई ने 5 से 11 सालों से एनओसी नहीं ली। इनमें अमन अस्पताल, बाथ अस्पताल एंड नर्सिंग होम, बावा अस्पताल, एनएनजेड अस्पताल, गुप्ता मल्टीस्पेशलिटी, स्विफ्ट, सनराइज, संधू प्राइम, देवगन अस्पताल, शौर्य नर्सिंग होम जैसे नाम शामिल हैं। सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल गुरु नानक देव अस्पताल, जिसकी क्षमता 891 बेड की है, वह भी एनओसी के बिना सूची में शामिल है। इसी तरह 400 बेड वाला गवर्नमेंट मेंटल अस्पताल, टीबी अस्पताल और रामलाल गवर्नमेंट आई-ईएनटी अस्पताल तक शामिल हैं। वहीं मॉडर्न सेंट्रल जेल फताहपुर, कई मिनी पीएचसी, पीएचसी, ग्रामीण अस्पताल,पुलिस अस्पताल भी एनओसी नहीं ले रहे हैं। समाजसेवी गुरमीत सिंह बबलू ने इसे बेहद गंभीर मामला बताते हुए कहा कि जब सरकारी अस्पताल ही नियमों को ताक पर रख रहे हैं, तो निजी अस्पतालों से उम्मीद ही क्या की जा सकती है। अस्पताल प्रशासन और प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड की आपसी मिलीभगत से लोगों को स्वास्थ्य जोखिम उठाने पड़ रहे हैं। जीएनडीएच के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डा. कर्मजीत सिंह ने बताया कि पॉल्यूशन विभाग से एनओसी लेने के लिए आवेदन किया था, लेकिन उस समय विभाग ने आब्जेक्शन लगा दिया गया था कि अस्पताल में 1200 बेड है, इसलिए नए सिरे से एनओसी के लिए आवेदन किया जाएगा। उन्होंने 1200 बेड के लिए एनओसी का आवेदन किया और करीब सवा 9 लाख की फीस भी जमा करा दी गई है। यह एनओसी पॉल्यूशन विभाग के चंडीगढ़ कार्यालय से ऑनलाइन भेजी जानी है। शायद यह एनओसी एक हफ्ते तक उन्हें हासिल हो जाएगी।


