बिल्डर ने गिरवी रखा फ्लैट, खरीदार को मिला नोटिस:बैंक ने निकाला नीलामी का नोटिस, कोर्ट ने हस्तक्षेप से किया इनकार

राजस्थान हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी बिल्डर द्वारा लिए गए लोन के बदले बैंक किसी खरीदार के फ्लैट पर कब्जा करने का नोटिस देता है, तो इसके खिलाफ सीधे हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि पीड़ित पक्ष को डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल (डीआरटी) में अपील करनी चाहिए क्योंकि सरफेसी एक्ट में इसके लिए प्रभावी प्रावधान मौजूद हैं। जस्टिस सुनील बेनीवाल की एकल पीठ ने जोधपुर निवासी राजीव भंडारी की याचिका को सुनवाई योग्य नहीं मानते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट ने इस मामले पर 14 जनवरी 2026 को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे 22 जनवरी 2026 को सुनाया गया। बिल्डर ने लोन लिया, नोटिस खरीदार को मिला घटनाक्रम के अनुसार, याचिकाकर्ता राजीव भंडारी ने 21 अगस्त 2018 को बिल्डर पार्श्वनाथ डवलपर्स से जोधपुर की पार्श्वनाथ सिटी में एक फ्लैट खरीदा था। यह फ्लैट जिस जमीन पर बना था, उसका सब-डिविजन जोधपुर जेडीए द्वारा 30 अगस्त 2017 को अनुमोदित किया गया था। राजीव अपने परिवार के साथ वहां रह रहे थे। विवाद तब खड़ा हुआ जब 24 सितंबर 2025 को एडलवाइस एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी ने सरफेसी एक्ट के तहत एक नोटिस जारी कर फ्लैट को अपने कब्जे में लेने की कार्यवाही शुरू कर दी। पता चला कि बिल्डर पार्श्वनाथ डवलपर्स ने इस फ्लैट को गिरवी रखकर लोन लिया था और उसे चुकाया नहीं। याचिकाकर्ता: “मैं कर्जदार नहीं हूं”, बिल्डर ने धोखा किया कोर्ट में याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि राजीव भंडारी न तो कर्जदार हैं और न ही गारंटर। वकील ने बताया कि बैंक ने सरफेसी एक्ट की जरूरी प्रक्रिया का पालन किए बिना सीधे नोटिस जारी कर दिया। वकील ने तर्क दिया कि चूंकि यह मामला संपत्ति के मालिकाना हक से जुड़ा है, इसलिए डीआरटी के पास सुनवाई का अधिकार नहीं है और हाई कोर्ट को इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए। उन्होंने “सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया बनाम प्रभा जैन (2025)” के फैसले का हवाला भी दिया। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने केवल रिट ही दायर नहीं की, बल्कि बिल्डर द्वारा दिए गए धोखे के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज करवाई है। कोर्ट का फैसला: प्राइवेट बैंक ‘स्टेट’ नहीं, रिट नहीं चलेगी इस मामले में कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी एक प्राइवेट फाइनेंस कंपनी है, जो संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत “राज्य” (स्टेट) की परिभाषा में नहीं आता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निजी बैंक या एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी अपने व्यावसायिक लेन-देन में कोई “सार्वजनिक कार्य” नहीं कर रहे हैं, इसलिए उनके खिलाफ रिट याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती। अंतिम निर्देश: DRT में अपील की छूट कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील द्वारा दिए गए “सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया” वाले दृष्टांत को इस मामले में लागू करने से मना कर दिया, क्योंकि यहां सीधे तौर पर टाइटिल का विवाद नहीं, बल्कि रिकवरी की कार्यवाही का विरोध है। अंततः कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को कानून के अनुसार उचित मंच (डीआरटी) के समक्ष अपनी बात रखने की छूट दी है।

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