राजस्थान हाईकोर्ट ने बीएलओ नियुक्ति को लेकर सरकारी कर्मचारियों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बीएलओ की नियुक्ति में चुनाव आयोग के नियमों का सख्ती से पालन होना चाहिए, जिसके तहत प्राथमिकता उसी कर्मचारी को दी जानी चाहिए, जो उस बूथ का वोटर हो। जस्टिस मुन्नूरी लक्ष्मण की कोर्ट ने श्रीगंगानगर निवासी पालासिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए सोमवार को यह निर्देश दिया है। मामला श्रीगंगानगर जिले का है। श्रीकरणपुर के गांव 6 ओबी के रहने वाले याचिकाकर्ता पालासिंह को 23 जुलाई 2025 के एक आदेश के तहत पोलिंग बूथ संख्या 9 (बिरमादेवी राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, लालगढ़ बिश्नोइयान) में बीएलओ नियुक्त कर दिया गया। जबकि, पाला सिंह खुद बूथ संख्या 3, श्रीकरणपुर के वोटर हैं। याचिकाकर्ता के वकील इंद्रजीत यादव ने तर्क दिया कि यह नियुक्ति चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है। वकील ने तर्क दिया: स्थानीय कर्मचारी उपलब्ध थे याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया- 5 जून 2025 की संशोधित गाइडलाइन के अनुसार, बीएलओ उसी को बनाया जाना चाहिए जो उस पोलिंग स्टेशन का वोटर हो। वकील ने तर्क दिया कि जिस बूथ पर पाला सिंह को लगाया गया है, वहां ऐसे कई अन्य कर्मचारी उपलब्ध हैं, जो वहीं के वोटर हैं। इसके बावजूद नियमों को दरकिनार कर याचिकाकर्ता की नियुक्ति की गई, जो कि गलत है। चुनाव आयोग की गाइडलाइन: 3 स्तरीय व्यवस्था कोर्ट ने चुनाव आयोग की गाइडलाइन के तीनों प्रमुख प्रावधानों को रेखांकित किया: क्लॉज 1.1: सबसे पहले, उस क्षेत्र के वोटर के रूप में पंजीकृत ‘ग्रुप सी’ या उससे ऊपर के सरकारी कर्मचारी को नियुक्त किया जाए। क्लॉज 1.2: यदि नियमित कर्मचारी न हो तो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, संविदा शिक्षक या केंद्र सरकार के कर्मचारी (जो वहां के वोटर हों) को नियुक्त किया जा सकता है। क्लॉज 1.3: बाहरी व्यक्ति की नियुक्ति तभी हो सकती है, जब उपरोक्त दोनों श्रेणियों में स्थानीय वोटर उपलब्ध न हों। कोर्ट का निर्देश: 15 दिन में पुनर्विचार करें कोर्ट ने पाया कि नियुक्ति आदेश में कहीं भी यह जिक्र नहीं है कि स्थानीय कर्मचारी उपलब्ध नहीं थे, इसलिए सीधे बाहरी व्यक्ति को लगाना सही नहीं प्रतीत होता। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह एक सप्ताह के भीतर विभाग को उन स्थानीय कर्मचारियों के नामों के साथ एक रिप्रेजेंटेशन प्रस्तुत करें, जो उस बूथ के वोटर हैं। इसके बाद, अधिकारियों को इस रिप्रेजेंटेशन पर 15 दिन के भीतर पुनर्विचार कर उचित आदेश पारित करना होगा। जबरदस्ती कार्रवाई पर रोक कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जब तक इस रिप्रेजेंटेशन का निस्तारण नहीं हो जाता, तब तक याचिकाकर्ता के खिलाफ ड्यूटी ज्वॉइन न करने पर कोई भी दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। हालांकि, कोर्ट ने यह भी छूट दी कि यदि अधिकारी यह पाते हैं कि स्थानीय कर्मचारी वास्तव में उपलब्ध नहीं हैं, तो वे गाइडलाइन के क्लॉज 1.3 के तहत पुरानी नियुक्ति जारी रख सकते हैं।


