जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग झुंझुनूं ने स्वास्थ्य बीमा दावों को लटकाने वाली बीमा कंपनियों को कड़ा संदेश दिया है। आयोग ने रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी की कार्यप्रणाली को ‘अनुचित और उपभोक्ता विरोधी’ करार देते हुए पीड़ित उपभोक्ता के पक्ष में अहम फैसला सुनाया है। आयोग ने कंपनी को क्लेम राशि के साथ-साथ 11 वर्षों की देरी के लिए ब्याज और मानसिक संताप के लिए क्षतिपूर्ति राशि देने का निर्देश दिया है। कंपनी को 1,81,529 का भुगतान करना होगा। वाद दायर करने की तिथि से 9% वार्षिक ब्याज देय होगा। मानसिक एवं शारीरिक परेशानी के लिए 15,500 और अदालती खर्च के लिए ₹10,500 अतिरिक्त देने होंगे। यदि तय समय में भुगतान नहीं हुआ, तो ब्याज दर बढ़कर 12.5% हो जाएगी। यह है पूरा मामला खेतड़ी के बड़ौदी की ढाणी निवासी शीशराम सैनी ने वर्ष 2013 में रिलायंस जनरल इंश्योरेंस से हेल्थ पॉलिसी ली थी। अक्टूबर 2014 में अचानक तबीयत बिगड़ने पर उन्हें जयपुर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी हार्ट सर्जरी हुई। इलाज में करीब दो लाख रुपये खर्च हुए। बीमा धारक ने नियमानुसार सभी मेडिकल बिल और दस्तावेज कंपनी को सौंपे, लेकिन कंपनी ने दावों को स्वीकार करने के बजाय अनावश्यक तकनीकी आपत्तियां लगाकर क्लेम निरस्त कर दिया। आयोग की कड़ी टिप्पणी: मुनाफा नहीं, निष्पक्षता दिखाएं कंपनियां मामले की सुनवाई के दौरान आयोग के अध्यक्ष मनोज कुमार मील एवं सदस्य प्रमेन्द्र कुमार सैनी की पीठ ने पाया कि कंपनी ने 11 वर्षों तक मामले को लटकाए रखा। बीमा कंपनी से यह उम्मीद की जाती है कि वह बीमा धारक के साथ निष्पक्ष व्यवहार करे, न कि केवल अपने मुनाफे की परवाह। राष्ट्रीय लोक अदालत के कई अवसर मिलने के बावजूद कंपनी ने समझौता करने के बजाय एक ही तरह के प्रार्थना पत्र बार-बार लगाकर समय बर्बाद किया। सुप्रीम कोर्ट की नजीर का हवाला आयोग ने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों (नजीर) का जिक्र करते हुए स्पष्ट किया कि बीमा कंपनियां केवल दस्तावेज न होने का बहाना बनाकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकतीं। आयोग ने माना कि दस्तावेजों की फोटोकॉपी उपलब्ध होने के बावजूद कंपनी का टालमटोल करना ‘सेवा में गंभीर कमी है।


