बोरगांव में बंगाली समुदाय ने पारंपरिक चरक पूजा के साथ नववर्ष का स्वागत किया। इस अवसर पर खजूरभंगा के कलाकारों ने कांटों से भरे खजूर के पेड़ पर नंगे पांव चढ़कर अद्भुत प्रदर्शन किया। शिव-पार्वती को समर्पित इस पूजा को नील पूजा भी कहा जाता है। बंगाली समुदाय के लोग रंग-बिरंगे परिधानों में पूजा स्थल पर पहुंचे। महिलाएं लाल बॉर्डर वाली साड़ियों में और पुरुष धोती-कुर्ता पहनकर आए। चरक पूजा, जिसे नाथ पूजा या शिवगजान भी कहते हैं, बंगाल की प्राचीन लोक परंपरा है। इसमें भक्त कठोर व्रत और उपवास रखते हैं। पूजा में झूले पर लटकते साधुओं की झांकी, पारंपरिक नृत्य और ढाक की थाप ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। बच्चों के लिए पारंपरिक खेलों का आयोजन समुदाय के वरिष्ठ सदस्यों ने कहा कि चरक पूजा उनकी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। यह संयम, तप और भक्ति का संदेश देती है। कार्यक्रम में पूजा-अर्चना के बाद भोग वितरण किया गया। बच्चों के लिए पारंपरिक खेलों का आयोजन भी हुआ। समारोह के अंत में सभी ने एक-दूसरे को ‘शुभो नोबोबर्षो’ की शुभकामनाएं दीं। यह आयोजन न केवल बंगाली समुदाय को एकजुट करने में सफल रहा, बल्कि स्थानीय लोगों को भी इस सांस्कृतिक परंपरा से परिचित कराया।


