बिलासपुर की श्रद्धा वैष्णव जन्म से सुन-बोल नहीं सकतीं। पर क्रिकेट ही उनकी भाषा बन गई। वे बाएं हाथ की तेज गेंदबाज हैं। छत्तीसगढ़ की पैरा टीम में नहीं बल्कि 10 साल से सामान्य महिला क्रिकेट टीम में खेल रही हैं। वे किसी राज्य की क्रिकेट टीम में खेलने वाली देश की पहली महिला खिलाड़ी रही हैं। वे लगातार 3 बार स्कूल नेशनल में राज्य का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। वर्तमान में घरेलू क्रिकेट के मैचों में अपने ग्रुप की टीम में लड़कों के बीच मुख्य गेंदबाज होतीं हैं। करियर में अब तक 70 से अधिक विकेट ले चुकी हैं। पहली क्रिकेटर जिसने हौसले से लिखी कहानी – पिता से बोली- मैं क्रिकेट खेलूंगी पिता बेटे को प्रैक्टिस कराने ले जाते थे, श्रद्धा ने इशारे में कहा- मैं भी खेलूंगी
श्रद्धा के पिता रमेश अपने छोटे बेटे को क्रिकेट की ट्रेनिंग दिलाने स्टेडियम ले जाते थे। वहां उसने इशारों में कहा कि मैं भी खेलूंगी। इस पर रमेश मान गए। उसे क्रिकेट अकादमी के कोच से मिलाने ले गए। स्पोर्ट एंड यूथ वेलफेयर क्रिकेट कोचिंग सेंटर के कोच दिलीप सिंह से बात की। श्रद्धा के क्रिकेटर बनने की चाह और बुलंद हौसले देखकर कोच दिलीप ने उसे कोचिंग देने की हामी भर दी। दूसरों के वीडियो दिखाकर समझाता था: कोच
श्रद्धा को शुरुआत में कोचिंग देने वाले दिलीप सिंह ने बताया कि शुरू में मैं श्रद्धा को इशारों से समझाता था। तो दिक्कत होती थी। फिर मैंने श्रद्धा की गेंदबाजी के वीडियो बनाए। फिर उसे दूसरे गेंदबाजों के वीडियो दिखाकर समझाना शुरू किया। तरकीब काम कर गई। वह मेरे इशारे भी समझने लगी। प्रैक्टिस में गेंद सही जगह पर डालने के लिए मैं पिच पर चूना डाल देता था। सुन नहीं पाने के कारण फील्डिंग में उसे चौकन्ना रहना पड़ता है। कप्तान भी इशारों से उसे निर्देश देती है। दिलीप का कहना है कि बतौर तेज गेंदबाज श्रद्धा ने सीम गेंदबाजी की बारीकियां सीख ली हैं। लेकिन उसे अभी रिवर्स स्विंग पर काम करना बाकी है। इशारों से होता है अन्य खिलाड़ियों से संवाद, ये अब आदत बन गया श्रद्धा मैदान पर बोल-सुन नहीं सकतीं, लेकिन इसका असर उनके खेल पर बिल्कुल नहीं दिखता। वे साइन लैंग्वेज के जरिए कप्तान और टीम की अन्य खिलाड़ियों से संवाद करती हैं। फील्डिंग बदलनी हो, रन लेने हों या रणनीति समझानी हो, सब कुछ इशारों में ही हो जाता है। टीम की खिलाड़ी भी श्रद्धा के इशारों को आसानी से समझ लेती हैं।


