ब्रिटिश सैनिकों के लिए 169 साल पहले बनी सेंट ल्यूक चर्च, रंगीन कांच की खिड़कियां मुख्य आकर्षण

भास्कर न्यूज | जालंधर क्रिसमस की तैयारियां अंतिम दौर में हैं। जालंधर सिटी के गिरजाघरों में रौनक है। अनुयायी शोभायात्राएं निकालकर प्रेम और भाईचारे का संदेश दे रहे हैं। जालंधर के प्राचीन गिरजाघरों में रोजाना अनुयायी आते हैं। जालंधर कैंट और आदर्श नगर में प्राचीन गिरजाघर जालंधर की भाईचारक विरासती निशानी हैं। तीनों चर्चा करीब 150 साल से ज्यादा पुरानी है और शहर में आस्था, शांति और भाईचारे का प्रतीक हैं। गोलक नाथ मेमोरियल चर्च का निर्माण लगभग 1895 के आसपास हुआ। उस समय जालंधर सिटी की आबादी की हदें इस चर्च के बाद खत्म हो जाती थी और चौतरफा खेतीबाड़ी से खुशहाल जमीनें होती थीं। सीमित आबादी, कम पक्की सड़कें और गिने-चुने स्थायी भवन। उसी दौर में यह चर्च मिशन कंपाउंड क्षेत्र में आस्था का केंद्र बनकर उभरी थी। इस चर्च का नाम रेव. गोलक नाथ चटर्जी के नाम पर रखा गया, जो उत्तर भारत के शुरुआती भारतीय ईसाई प्रचारकों में से थे। यह तथ्य इस चर्च को विशेष बनाता है, क्योंकि इसकी जड़ें भारतीय समाज के भीतर से निकली धार्मिक यात्रा से जुड़ी हैं। उन्होंने जालंधर में शिक्षा के प्रसार में अहम हिस्सेदारी दी थी। आज भी चर्च की इमारत अपने पुराने स्वरूप को संभाले हुए है। ऊंची छत, मोटी दीवारें, घंटाघर अपनी खास शैली से अलग छटा बिखेर रही है। जालंधर कैंट में सेंट मैरी कैथेड्रल चर्च 1847 में बनाई गई थी। ये भव्य गिरजाघर जालंधर के इतिहास की विरासती निशानी है। आज भी देश-विदेश से अनुयायी यहां आते हैं। समय के साथ जो नवनिर्माण हुए, उनका उद्घाटन 1989 में हुआ। ये दिन सांस्कृतिक सौहार्द और आपसी सम्मान का प्रतीक बन गया। दो ऊंचे मीनार, रंगीन कांच की खिड़कियां और सुंदर प्रांगण ऐतिहासिक है। यह जालंधर डायोसिस का केंद्र है। जालंधर कैंट स्थित चर्च का निर्माण 1856 में हुआ था। यह चर्च ब्रिटिश शासनकाल में सेना के अधिकारियों और सैनिकों के लिए बनाई गई थी। नुकीले मेहराब, लंबा प्रार्थना कक्ष, रंगीन कांच की खिड़कियां, और दीवारों पर लगे स्मृति-पट्ट उस समय के इतिहास और स्थापत्य कला की जीवंत झलक प्रस्तुत करते हैं। इसकी विशाल ऊंचाई, सुंदर गुंबद और शांत वातावरण दर्शकों को इतिहास के गौरवपूर्ण क्षणों की याद दिलाते हैं। यह चर्च सांस्कृतिक विरासत और शहर की पहचान का भी प्रतीक है।

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