भगत सिंह बनकर सड़कों पर उतरे शिक्षक:दुखी भारत माता तिरंगा थामे चल रही थी, 1 हजार टीचर्स ये प्रदर्शन इसलिए ताकी सरकार दे नौकरी

हाथों में जंजीर, कैदियों वाले कपड़े, सामने तिरंगा थामे चलती दिखी भारत माता…। ये दृश्य था बी.एड. प्रशिक्षित सहायक शिक्षकों की रैली का। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव बनकर ये शिक्षक सड़कों पर उतरे। रायपुर के बस स्टैंड से टिकरापारा शहीद भगत सिंह की प्रतिमा तक ये शिक्षक गए। वहां भगत सिंह को 23 मार्च उनके शहीदी दिवस पर नमन किया। इस रैली में 1 हजार से अधिक शिक्षक शामिल हुए। सड़क पर एक लम्बी सी कतार में चल रहे इन शिक्षकों को जिसने देखा रुककर देखता ही रहा गया। ये सभी शिक्षक यूं सड़क पर इस वजह से उतरे ताकि इन्हें इनकी नौकरी सरकार दे दे। तीन महीने से जारी है संघर्ष, मगर सरकार की चुप्पी
प्रदेश के हजारों बी.एड. प्रशिक्षित सहायक शिक्षक लगातार धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। मगर अब तक सरकार ने इनकी मांगें मानी नहीं है। ये क्रमिक अनशन, सामूहिक उपवास, मशाल जुलूस और ज्ञापन सौंपने जैसे कई प्रदर्शन कर चुके हैं। भर्ती के बाद इन शिक्षकों को बर्खास्त कर दिया गया था। शिक्षकों की यह मांग है कि चूंकि सरकार ने बी.एड. धारकों को प्राथमिक शिक्षक के पद पर भर्ती किया था, अब उन्हें अयोग्य ठहराना अन्यायपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राज्य सरकार के पास अधिकार है कि वह इन शिक्षकों को अन्य पदों पर समायोजित करे, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
आंदोलन से जुड़े पदाधिकारियों ने कहा- इस संबंध में मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री, तथा अन्य संबंधित अधिकारियों से कई बार वार्ता की गई, लेकिन अभी तक सिर्फ आश्वासन ही मिले हैं, समाधान नहीं। शिक्षकों का कहना है कि यदि सरकार शीघ्र ही ठोस निर्णय नहीं लेती है, तो उनका आंदोलन और उग्र होगा।

खून से लिख चुके हैं लैटर
हाल ही में छत्तीसगढ़ में सरकारी नौकरी से निकाले गए B.Ed सहायक शिक्षक फिर धरने पर हैं। इस बार अभ्यर्थियों ने खून से मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को लेटर लिखा है। उन्होंने सरकार से समायोजन की मांग की है। शिक्षकों का कहना है कि, वे लंबे समय से शांतिपूर्ण विरोध कर रहे थे, लेकिन जब कोई समाधान नहीं निकला तो उन्होंने यह कदम उठाया। 8 मार्च के सहायक शिक्षकों के आंदोलन का दूसरा चरण जारी है। रायपुर के तूता धरना स्थल पर 2,897 बर्खास्त B.Ed. प्रशिक्षित सहायक शिक्षक धरने पर हैं। आचार संहिता से पहले भी करीब डेढ़ महीने तक अलग-अलग तरीके से प्रदर्शन किया गया था।

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