आधुनिकता में डूबे धर्म को न समझने वाले लोग अधिकांशत: कहते हैं कि भगवान तो भोग ग्रहण नहीं करते, फिर लोग चढ़ाते क्यों हैं? वे यह नहीं जानते कि सबकुछ भगवान का ही है। भगवान का भगवान को ही हम अर्पण करते हैं। भगवान तो भाव के भूखे हैं। हम जो प्रसाद भगवान को चढ़ाते हैं, भगवान वायु तरंगों के माध्यम से भोग का सूक्ष्म अंश ग्रहण कर लेते हैं। ठीक उसी तरह जैसे एक भंवरा पुष्प के सूक्ष्म अंश को ग्रहण करके तृप्त हो जाता है। प्रसाद ग्रहण करने के कारण न तो पुष्प का कोई रंग बदलता है, न रूप बदलता है और न ही वजन घटता-बढ़ता है। इसी तरह भगवान जब प्रसाद के सूक्ष्म अंश को ग्रहण करते हैं तो भोग के रंग, रूप, आकार में कोई परिवर्तन नहीं होता है। केवल स्वाद में परिवर्तन होता है। एरोड्रम क्षेत्र में दिलीप नगर नैनोद स्थित शंकराचार्य मठ इंदौर के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने अपने नित्य प्रवचन में रविवार को यह बात कही। भगवतता को प्राप्त कर भगवान बन जाता है भक्त महाराजश्री ने बताया कि सब-कुछ भगवान का ही है। पुष्प में भी भगवान हैं, उसकी सुगंध से भगवान पहचान कराते हैं कि मैं गुलाब हूं या मोगरा। नारियल पृथ्वी के कितने ऊपर लगा रहता है, लेकिन उसमें पानी आ जाता है। व्यक्ति स्नान करता है, तो शरीर के अंदर पानी नहीं जाता, पर पसीना बाहर आ जाता है। यही तो प्रमाण है कि भगवान सब जगह हैं और भाव के भूखे हैं। जब तक भाव का अभाव रहेगा, तब तक परमात्मा का अनुभव नहीं हो सकता। परमात्मा का अनुभव तभी होता है, जब व्यक्ति तप-साधना करता है और भगवान को प्राप्त करने के लिए व्याकुल हो जाता है, सुदामा की तरह भगवान से कुछ मांगता नहीं है। सच्चा भक्त तो सिर्फ भगवान को प्रसन्न देखना चाहता है। जो भगवान का हो जाता है, वह संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है। भगवान का अनुभव होने पर भक्त यत्र-तत्र-सर्वत्र भगवान को ही देखता है। और भगवतता को प्राप्त कर भगवान बन जाता है।


