भगवान जगन्नाथ के रथ के चारों ओर लगेंगी 8-8 घंटियां, सभी चक्कों में स्टील के स्ट्रिप

धुर्वा स्थित जगन्नाथपुर मंदिर में ऐतिहासिक रथयात्रा 27 जून को निकाली जाएगी। इसे लेकर मंदिर समिति जोरशोर से तैयारी में जुटी है। रथ मरम्मत का काम तेजी से चल रहा हैं | इसके साथ ही अब रंग रोगन का कार्य शुरू होगा। पुरी से आए रथ कारीगर दशरथ महाराणा की टीम और स्थानीय कारीगर महाबीर लोहरा की टीम भी इस कार्य में जुटी हुई है। इस कार्य में पूरी से 11 कारीगर के साथ में स्थानीय कारीगर भी लगे हैं। रथ का रंग-रोगन में पुरी के 8 कारीगर लगे हैं। रथ को सजाने के लिए पुरी से वस्त्र व अन्य सजावट के सामान मंगाए गए हैं। रथ में लगाई जाने वाली घंटियां दान दाताओं के द्वारा दी गई है। रथ के चारों द्वार पर 8-8 घंटी लगाई जाएगी। रथ यात्रा के लिए पुरी से 50-50 बीटखो रस्सी मंगाए गए हैं और रांची के दान दाताओं के द्वारा 50-50 मीटर के चार रस्सी दी गई है। रथ के सभी चक्कों में स्टील के स्ट्रिप लगाए गए है, ताकि रथ को जाने में कोई परेशानी न हो। पुरी की तर्ज पर ही रथ निर्माण किया जा रहा है। यम या र| सिंहासन, गज, द्वारपाल, अश्व आदि रथ में लगाए जाएंगे। रथ 35 फीट ऊंचा और 25 फीट चौड़ा है। बता दें कि 5 जुलाई को गुंडिचा भोग महास्नान के बाद महाप्रभु जगन्नाथ 15 दिनों के लिए एकांतवास में चले गए हैं। इनका औषधीय उपचार चल रहा है। 26 जून को उन्हें एकांतवास से निकाला जाएगा और शाम को नेत्रदान किया जाएगा। 27 जून को ऐतिहासिक रथयात्रा निकाली जाएगी। 5 जुलाई को गुंडिचा भोग के साथ 6 जुलाई को घूरती रथ यात्रा है। 10 दिनों के मेला में लगभग 10 लाख लोग शिरकत करेंगे। मेला में लगभग 3000 दुकानें लगाई जाएंगी। रथयात्रा 27 जून को, 35 फीट ऊंचे व 25 फीट चौड़े रथ की मरम्मत में जुटे पुरी के कारीगर जगन्नाथपुर मेला की निविदा पर उठे सवाल रथ के मरम्मत करते हुए स्थानीय कारीगर महावीर लोहरा, वह हर रोज सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक काम करते हैं | जगन्नाथपुर मंदिर न्यास समिति के निवर्तमान सदस्य डॉ. शिवेश कुमार सिंह ने मेला की निविदा प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि 1691 से लेकर 2022 तक यह मेला नि:शुल्क होता था। अब लगातार तीसरे वर्ष निविदा निकाली जा रही है, जिससे परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों को नुकसान हो रहा है। यह मेला श्रद्धा, भक्ति, कला, संस्कृति और ग्रामीण कारीगरों के उत्पादों का संगम रहा है, लेकिन अब भारी वसूली के कारण मूल स्वरूप प्रभावित हो रहा है। ठेकेदारों की हिस्सेदारी से आदिवासी कलाकार और कारीगर हाशिए पर जा रहे हैं। डॉ. सिंह ने सुझाव दिया कि यदि निविदा अनिवार्य हो, तो पारंपरिक कलाकारों और स्थानीय उत्पादकों को शुल्क मुक्त रखा जाए। उन्होंने राज्य सरकार से हस्तक्षेप कर परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखने की अपील की।

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