राजस्थान हाईकोर्ट ने भरण-पोषण (मेंटेनेंस) की बकाया राशि वसूलने के लिए पति की कृषि भूमि के साथ आवासीय मकान को भी कुर्क कर नीलाम करने के फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया है। खास बात यह है कि जिस घर की नीलामी का निर्देश दिया गया था, उसी में याचिकाकर्ता पत्नी और उसके बच्चे फिलहाल रह रहे हैं। जस्टिस मुकेश राजपुरोहित की एकलपीठ ने मामला दोबारा सुनवाई के लिए भीलवाड़ा की फैमिली कोर्ट नंबर-2 को भेज दिया। एकलपीठ ने कहा कि पत्नी द्वारा घर खरीदने में किए कथित आर्थिक योगदान और उसमें उसके व बच्चों के रहने के तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। फैमिली कोर्ट सभी तथ्यों पर देखकर पुनर्विचार करे। पति के रकम नहीं देने पर कोर्ट ने दिए थे जमीन और मकान नीलामी के निर्देश
भीलवाड़ा में आर.के. कॉलोनी निवासी उर्मिला व तीन बच्चों की ओर से फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण दिलाने की अर्जी लगाई गई थी। पति की ओर से निर्धारित राशि नहीं देने पर फैमिली कोर्ट ने 9 अक्टूबर 2025 को पारित आदेश में लक्ष्मणसिंह की कृषि भूमि और एक आवासीय मकान अटैच कर भीलवाड़ा कलेक्टर को नीलामी से बकाया मेंटेनेंस की वसूली के निर्देश दिए थे। मेंटेनेंस की रिकवरी के लिए अर्जी खुद पत्नी की ओर से दायर की गई थी, लेकिन नीलामी की प्रक्रिया उस घर तक पहुंचने पर (जिसमें वह और बच्चे रहते हैं) उर्मिला ने हाईकोर्ट की शरण ली। उनका तर्क था कि इस मकान में वह खुद और बच्चे रहते हैं। इसलिए बिना उनकी हिस्सेदारी और रहन-सहन के अधिकार पर विचार किए सीधे नीलामी का आदेश देना न्यायसंगत नहीं है। घर खरीदने में पत्नी का भी आर्थिक योगदान
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान 1 जून 2011 का एक एग्रीमेंट पेश किया गया। इससे प्रथमदृष्टया यह सामने आया कि विवादित मकान 6.75 लाख रुपए में खरीदा गया था। इसमें से 1 लाख 1 हजार रुपए अग्रिम रूप से पति ने चुकाए थे। वहीं बाकी रकम में से 3.50 लाख रुपए पत्नी उर्मिला ने अपनी बचत, स्त्रीधन और गहने बेचकर देना बताया। याचिकाकर्ता पक्ष ने तर्क दिया कि जिस मकान की नीलामी से भरण-पोषण वसूलने की बात हो रही है। वही घर उनका वर्तमान निवास है। उसकी खरीद में पत्नी का भी वित्तीय योगदान है। ऐसे में न तो उनके सिर से छत छीनने की स्थिति पैदा की जा सकती है। न ही उनके योगदान की अनदेखी करते हुए संपत्ति की नीलामी का आदेश कायम रखा जा सकता है। आदेश ‘सेट असाइड’, फैमिली कोर्ट को पुनर्विचार के निर्देश
जस्टिस मुकेश राजपुरोहित की एकलपीठ ने सोमवार को आदेश सुनाते हुए कहा कि प्रथमदृष्टया यह प्रतीत होता है कि जिस आवासीय मकान की कुर्की और नीलामी के निर्देश दिए गए। उसी में पत्नी और बच्चे रह रहे हैं। वहीं उसकी खरीद में पत्नी की ओर से भी रकम दी गई है। कोर्ट ने माना कि ये “महत्वपूर्ण तथ्य” फैमिली कोर्ट के समक्ष या तो रखे नहीं जा सके या उन पर विचार नहीं किया गया, जबकि इनका असर रिकवरी के तरीके पर पड़ सकता है। इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने 9 अक्टूबर 2025 का आदेश सेट असाइड कर दिया। पूरा मामला पुनर्विचार के लिए फैमिली कोर्ट नंबर-2 भीलवाड़ा को वापस भेज दिया। फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया गया है कि दोनों पक्षों को सुनकर पत्नी द्वारा पेश अतिरिक्त दस्तावेजों और तथ्यों को देखते हुए भरण-पोषण की वसूली की अर्जी पर कानून के अनुरूप नया आदेश पारित किया जाए। अगला फैसला फैमिली कोर्ट को ही सुनाना होगा
हाईकोर्ट ने कहा कि वह इस स्तर पर स्वयं गुजारा भत्ता रिकवरी के तरीके या संपत्ति नीलामी पर अंतिम राय नहीं दे रहा। बल्कि सिर्फ यह सुनिश्चित कर रहा है कि फैमिली कोर्ट सभी प्रासंगिक तथ्यों, खास तौर पर पत्नी के योगदान और निवास अधिकार पर विचार करने के बाद आदेश पारित करे। अब अगला फैसला भीलवाड़ा फैमिली कोर्ट को सुनाना होगा।


