अंदरुनी लोहगढ़ गेट स्थित प्राचीन घई मंदिर में जय भोलेनाथ भजन मंडली के तत्वावधान में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दिव्य सत्र का छठा दिवस अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर पूज्य श्री कुंडल जी महाराज द्वारा प्रस्तुत की गई कथा को श्रवण कर श्रद्धालु भक्ति रस में सराबोर हो गए। कथा के दौरान महाराज जी ने श्रीमद्भागवत के प्राण स्वरूप महारास की अत्यंत भावपूर्ण और विस्तृत व्याख्या की। उन्होंने बताया कि किस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों में दिव्य अनुराग उत्पन्न हुआ और भगवान गोपियों के मध्य से अंतरध्यान हो गए। भगवान के वियोग में गोपियों द्वारा गाए गए गोपी गीत ने संपूर्ण वातावरण को करुणा और भक्ति से भर दिया। गोपियों की अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण पुनः प्रकट हुए और दिव्य महारास का आयोजन किया। महाराज जी ने बताया कि यह रस कथा श्रीमद्भागवत का हृदय है और भगवान से संबंधित पांच प्रमुख पुराणों में इसका विशेष उल्लेख मिलता है। इसके पश्चात कथा के दशम स्कंध में रुक्मणि विवाह प्रसंग का सुंदर वर्णन किया गया। महाराज जी ने बताया कि किस प्रकार भीष्मक राजा की पुत्री रुक्मणि, भगवान श्रीकृष्ण से विवाह की कामना करती हैं और श्रीकृष्ण उन्हें हरकर विदर्भ से द्वारका ले जाते हैं तथा उनसे विधिवत विवाह रचाते हैं। रुक्मणि मंगल की इस दिव्य कथा को सुनकर उपस्थित श्रद्धालु आनंदित हो उठे। भजन-कीर्तन और जयकारों से मंदिर परिसर भक्तिमय बना रहा। आयोजकों ने बताया कि कथा का क्रम आगामी दिनों में भी इसी श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ जारी रहेगा।


