दबोह क्षेत्र में आयोजित सात दिवसीय भागवत कथा के छठे दिन गुरुवार को साध्वी सुमन सरगम ने श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह का मनमोहक प्रसंग सुनाया। यह कथा जनसहयोग से मां रणकोशला देवी के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित की जा रही है। अपने प्रवचन में साध्वी सुमन सरगम ने मस्तक पर तिलक लगाने के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का मस्तक खाली होता है, तो उसे देखने वाले का पुण्य शून्य हो जाता है। इसलिए, व्यक्ति को सदैव अपने मस्तक पर तिलक धारण करना चाहिए। साध्वी ने यह भी बताया कि विवाहित महिलाओं को अपने पति के नाम की बिंदी लगानी चाहिए। इससे यह ज्ञात होता है कि वे भगवान श्रीकृष्ण की परंपरा से जुड़ी हुई हैं। कथा के दौरान साध्वी सुमन सरगम ने भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं और महारास का विस्तार से वर्णन किया। महारास का वर्णन सुनकर उपस्थित श्रोता भावविभोर हो गए। उन्होंने समझाया कि श्रीकृष्ण लीलामृत के महारास में जीवात्मा का परमात्मा से मिलन होता है। जीव और परमात्मा तत्व ब्रह्मा के मिलन को ही महारास कहा जाता है। साध्वी ने आगे बताया कि जब जीव में अभिमान आता है, तो वह भगवान से दूर हो जाता है। हालांकि, जब कोई भगवान के अनुराग के विरह में होता है, तो श्रीकृष्ण उस पर अनुग्रह करते हैं और उसे दर्शन देते हैं। भगवान श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण का प्रथम विवाह विदर्भ देश के राजा की पुत्री रुक्मिणी के साथ हुआ था। उन्होंने कहा कि रुक्मिणी साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप हैं, जो नारायण से दूर नहीं रह सकतीं। श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह की झांकी ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण के लिए उपस्थित रहे।


