भारत-तिब्बत समन्वय संघ के केंद्रीय संयोजक हेमेंद्र प्रताप सिंह तोमर ने रविवार को राष्ट्रीय एवं प्रांतीय पदाधिकारियों के साथ धार की भोजशाला का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने भोजशाला के इतिहास, शिलालेखों एवं वर्तमान स्थिति का अवलोकन किया। भोजशाला मुक्ति यज्ञ के संयोजक गोपाल शर्मा ने शिलालेखों पर अंकित देवी-देवताओं के स्वरूपों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस प्रकार की आकृतियां मंदिर परंपरा से जुड़ी हैं, जो इस स्थल के धार्मिक महत्व को दर्शाती हैं। कहा- यह विशाल मंदिर परिसर रहा है
मां वाग्देवी (सरस्वती) मंदिर के दर्शन के पश्चात हेमेंद्र प्रताप सिंह तोमर ने कहा कि महाराजा भोज द्वारा निर्मित यह स्थल केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक विशाल मंदिर परिसर रहा है। उन्होंने इसे भारत की ज्ञान, संस्कृति और धर्म परंपरा का प्रतीक बताया। तोमर ने कहा कि भारत धर्म और ज्ञान की भूमि रहा है और मां सरस्वती की कृपा से ही देश को विश्वगुरु के रूप में पहचान मिली। तोमर ने भोजशाला परिसर का निरीक्षण करने के बाद अपनी व्यथा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अब हिंदू समाज को स्वयं आगे आकर मां वाग्देवी की मूर्ति को पूर्ण रूप से वापस लाकर स्थापित करना होगा। उन्होंने मांग की कि मूर्ति स्थापना से पूर्व अखंड पूजा प्रारंभ की जाए तथा मंदिर परिसर को उसके मूल स्वरूप में लाने की दिशा में आवश्यक कदम उठाए जाएं। 23 जनवरी को पूजा का आह्वान किया
उन्होंने हिंदू समाज से 23 जनवरी, बसंत पंचमी के पावन अवसर पर अखंड पूजा, आरती एवं हवन आयोजित कर मां वाग्देवी की पूर्ण स्थापना का संकल्प लेने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यह विषय केवल आस्था का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता और गौरव से जुड़ा हुआ है। भोजशाला परिसर से बाहर आकर तोमर ने कहा कि प्रत्यक्ष रूप से यह स्पष्ट है कि भोजशाला मां सरस्वती का मंदिर है। मां सरस्वती को साक्षी मानकर उन्होंने कैलाश मानसरोवर की मुक्ति के लिए भी संकल्प लिया, जो वर्तमान में चीन के नियंत्रण में है। उन्होंने मां वाग्देवी से प्रार्थना की कि कैलाश मानसरोवर पुनः देवभूमि के रूप में स्थापित हो तथा भोजशाला में मां वाग्देवी की पूर्ण स्थापना शीघ्र हो। इस अवसर पर संघ के पदाधिकारियों एवं हिंदू समाज ने भोजशाला सत्याग्रह स्थित ज्योति मंदिर में अखंड ज्योति के दर्शन किए। कार्यक्रम में संघ के विभिन्न पदाधिकारी एवं राजा भोज उत्सव समिति के सदस्य उपस्थित रहे।


