भोपाल आए पूर्व राजनयिक सैयद अकबरउद्दीन का कहना है कि 21वीं सदी में युद्ध, सुरक्षा नीति और विदेश नीति—तीनों की प्रकृति पूरी तरह बदल चुकी है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर उन्होंने कहा कि इसे केवल एक सैन्य कार्रवाई के रूप में देखना अधूरा नजरिया होगा। यह डिफेंस, डिप्लोमेसी और नरेटिव तीनों की एक साथ परीक्षा थी। पाकिस्तान से बातचीत की संभावनाओं, बांग्लादेश से जुड़े हालिया घटनाक्रम और फिलिस्तीन–इजरायल संघर्ष पर भारत के रुख को लेकर उन्होंने साफ किया कि भारत का स्टैंड किसी मजबूरी का नहीं, बल्कि बढ़ते राष्ट्रीय हितों और वैश्विक जुड़ाव की स्वाभाविक प्रक्रिया है। विदेश नीति को ब्लैक–वाइट नहीं, ग्रे के कई शेड्स में समझना जरूरी है। बता दें कि सैयद अकबरउद्दीन भारत भवन में आयोजित भेापाल लिट्रेचर फेस्टिवल में भाग लेने के लिए भोपाल पहुंचे थे। अकबरउद्दीन को पश्चिम एशिया मामलों का विशेषज्ञ माना जाता रहा है इसके अलावा वह तीन साल तक विदेश मंत्रालय में प्रवक्ता का पद भी रहे हैं। भारत का स्टैंड मजबूरी नहीं, बढ़ते हितों का नतीजा है
फिलिस्तीन, इजराइल और वेनेजुएला जैसे मुद्दों पर भारत के रुख को लेकर वे साफ कहते हैं कि यह मजबूरी की बात नहीं है। जैसे-जैसे देश के इंटरेस्ट (हित) बढ़ते हैं, वैसे-वैसे हर मुद्दे में इंटरेस्ट जुड़ जाता है। आज भारत के दोनों पक्षों से लिंक्स (संबंध) हैं और दोनों के साथ बातचीत है। चालीस साल पहले इजराइल से हमारे रिश्ते नहीं थे, तब हम जो चाहते थे, कह सकते थे। फिलिस्तीन पर भारत कभी खिलाफ नहीं गया
सैयद अकबरउद्दीन कहते हैं कि यह समझ लेना गलत है कि भारत न्यूट्रल (तटस्थ) हो गया है। 1947 से आज तक भारत ने कभी भी फिलिस्तीन के खिलाफ वोट नहीं किया है। कहीं सपोर्ट (समर्थन) किया गया है, कहीं अब्सटेन (मतदान से दूरी) किया गया है। अब्सटेन का मतलब नेगेटिव (नकारात्मक) नहीं होता। इसमें एक कंसिसटेंसी (निरंतरता) है, जिसे लोग अक्सर समझ नहीं पाते। विदेश नीति ब्लैक एंड वाइट नहीं होती
अकबरउद्दीन कहते हैं कि विदेश नीति को ब्लैक एंड वाइट (सही–गलत) में नहीं देखना चाहिए। उसके बीच ग्रे कलर (बीच का रास्ता) होता है और उस ग्रे के भी कई शेड्स (स्तर) होते हैं। भारत का रवैया न्यूट्रल नहीं है। हम वही स्टैंड लेते हैं जो हमारे हित में हो। फिलिस्तीन के मामले में भारत कभी ब्लैक (विरोधी) स्टैंड पर नहीं गया है।
बांग्लादेश का मामला पूरी तरह डोमेस्टिकली इंस्पायर्ड है
बांग्लादेश से जुड़े हालिया विवाद पर अकबरउद्दीन साफ कहते हैं कि बांग्लादेश इस वक्त डोमेस्टिकली इंसपायर्ड है (घरेलू राजनीति से प्रेरित)। वहां आज कोई इलेक्टेड गवर्नमेंट नहीं है और चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में यह सब उनके अपने दांव-पेंच हैं, जो पूरी तरह डोमेस्टिक पॉलिटिक्स (आंतरिक राजनीति) के लिए खेले जा रहे हैं। छोटे देश अक्सर बड़े देश पर ऐसे अटैक (प्रतीकात्मक हमले) करते हैं, क्योंकि वह लोकली डोमेस्टिकली (स्थानीय राजनीति में) चलता है। इसे सिक्योरिटी या नेशनल ह्यूमिलिएशन से जोड़ना गलत है
वे कहते हैं कि अगर कोई प्राइवेट ऑर्गनाइजेशन (निजी संस्था) किसी को किसी वजह से नहीं लेता, तो इसका यह मतलब नहीं कि सिक्योरिटी एडेंजर (सुरक्षा खतरे में) हो गई। बाद में इसे नेशनल ह्यूमिलिएशन कहना भी गलत है। भारत और बांग्लादेश के बीच लोगों के स्तर पर बहुत स्ट्रॉन्ग रिलेशनशिप्स (मजबूत रिश्ते) हैं। रिश्ते इस वक्त थोड़े नाजुक मोड़ पर जरूर हैं, लेकिन यह स्थायी स्थिति नहीं है। बातचीत होनी चाहिए, लेकिन उसके लिए माहौल भी चाहिए
पाकिस्तान से बातचीत के सवाल पर सैयद अकबरउद्दीन कहते हैं कि वे तो डिप्लोमैट (राजनयिक) रहे हैं, इसलिए हमेशा कहते हैं कि बातचीत होनी चाहिए। लेकिन बातचीत अपने आप नहीं होती। उसके लिए एक माहौल बनाना पड़ता है और उस माहौल के लिए कुछ काम भी करना पड़ता है। मौजूदा हालात में उन्हें नहीं लगता कि पाकिस्तान ऐसा माहौल बनाने के लिए तैयार है। यह चीज़ साइकिल्स (चरणों) में होती है। जब वह तैयार होगा, भारत हाथ बढ़ाएगा। पाकिस्तान अपने इंटरनल प्रॉब्लम्स में उलझा है
वे कहते हैं कि फिलहाल वह वक्त नहीं है, क्योंकि पाकिस्तान के पास इतने इंटरनल प्रॉब्लम्स (आंतरिक समस्याएं) हैं कि वह उन्हीं में उलझा रहेगा। जब वहां एक्सेसिव नेशनलिज्म (अत्यधिक राष्ट्रवाद) खत्म होगा और डोमेस्टिक फोकस (घरेलू मुद्दों पर अत्यधिक ध्यान) कम होगा, तब बातचीत का वक्त आएगा। और जब वक्त आएगा, बातचीत ज़रूर होगी। 21वीं सदी में बहुत कुछ बदल चुका है
सैयद अकबरउद्दीन कहते हैं कि 21वीं सदी में कूटनीति, डिफेंस पॉलिसी (रक्षा नीति) और मिलिट्री अलायंसेस (सैन्य गठबंधन) हर चीज़ में बहुत बड़े फेरबदल हुए हैं। भारत के लिए यह एक नया तरीके का युद्ध था। अगर 2000 से अब तक देखें, तो जितने भी टेरेरिस्ट टाइप ऑफ अटैक (आतंकवादी हमले) हुए, उनमें जवाबी कार्रवाई कन्वेंशनल (पारंपरिक) तरीके से नहीं हुई। इस सदी में यह पहली बार हुआ कि भारत के साथ ऐसा हुआ, इसलिए इसमें कई नए पहलू उभरकर सामने आए। अब तक निभा चुके कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां


