भीलवाड़ा में पाले से फसलों के बचाव की एडवाइजरी जारी:कृषि पर्यवेक्षक देंगे किसानों को निर्देश, पाला पड़ने पर हल्की सिंचाई करें

भीलवाड़ा जिले में पड़ रही कड़ाके की ठंड एवं शीत लहर से फसलों को बचाने के लिए कृषि विभाग ने एडवाईजरी जारी कर निर्देश दिए हैं कि वे किसानों को पाले से फसलों को बचाने की जानकारी दें। कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक विनोद कुमार जैन ने बताया कि शीत लहर एवं पाले से सर्दी के मौसम में लगभग सभी फसलों को नुकसान होता है। पाले के प्रभाव से पौधों की पत्तियां एवं फूल झुलस कर झड़ जाते हैं तथा अध-पके फल सिकुड़ जाते हैं। फलियों एवं बालियों में दाने नहीं बनते हैं व बन रहे दाने सिकुड़ जाते हैं। टाटियां बांधकर क्यारियों के किनारों पर लगाएं संयुक्त निदेशक जैन ने बताया कि शीत लहर एवं पाले से फसल की सुरक्षा के लिए पौध शालाओं के पौधों एवं सीमित क्षेत्र वाले उद्यानों या नगदी सब्जी वाली फसलों में भूमि के ताप को कम न होने देने के लिए फसलों को टाट, पोलीथिन अथवा भूसे से ढक दें। वायुरोधी टाटियां, हवा आने वाली दिशा की तरफ यानि उत्तर-पश्चिम की तरफ बांधे एवं नर्सरी, किचन गार्डन एवं कीमती फसल वाले खेतों में उत्तर-पश्चिम की तरफ टाटियां बांधकर क्यारियों के किनारों पर लगाएं तथा दिन में पुनः हटाएं। पाला पड़ने की सम्भावना हो करें फसलों में हल्की सिंचाई जब पाला पड़ने की सम्भावना हो तब फसलों में हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए, नमीयुक्त जमीन में काफी देरी तक गर्मी रहती है। भूमि का तापक्रम एकदम कम नहीं होता है जिससे तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस से नीचे नही गिरेगा। फसलों को पाले से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है। जिन दिनों पाला पड़ने की सम्भावना हो उन दिनों फसलों पर घुलनशील गंधक 0.2 प्रतिशत (2 ग्राम प्रति लीटर पानी) में घोल बनाकर छिड़काव करें। दो सप्ताह तक रहता है घोल का असर ध्यान रखें कि पौधों पर घोल की फुहार अच्छी तरह लगे छिड़काव का असर दो सप्ताह तक रहता है। यदि इस अवधि के बाद भी शीत लहर व पाले की सम्भावना बनी रहे तो छिड़काव को 15-15 दिन के अन्तर से दोहराते रहें या थायो यूरिया 500 पी.पी.एम. (आधा ग्राम) प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर छिड़काव करें। गंधक छिड़काव से पाले का बचाव उन्होंने बताया कि सरसों, गेहूँ, चना, आलू, मटर जैसी फसलों को पाले से बचाने में गंधक का छिड़काव करने से न केवल पाले से बचाव होता है। बल्कि पौधों में लौहा तत्व की जैविक एवं रासायनिक सक्रियता बढ़ जाती है। जो पौधों में रोग रोधिता बढ़ाने में एवं फसल को जल्दी पकाने में सहायक होती है। किसान दीर्घकालीन उपाय के रूप में फसलों को बचाने के लिये खेत की उत्तरी-पश्चिमी मेड़ों पर तथा बीच-बीच में उचित स्थानों पर वायु अवरोधक पेड़ जैसे शहतूत, शीशम, बबूल, खेजड़ी, अरडू आदि लगा दिये जाये तो पाले और ठंडी हवा के झोंकों से फसल का बचाव हो सकता है।

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