भूपेश बोले- निर्वाचन आयोग भाजपा की बंधुआ बन गई:बालोद में कहा- न्यायपालिका पर दबाव, संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कांग्रेस की संविधान बचाओ रैली में बालोद पहुंचे। भूपेश बघेल ने कहा कि संविधान ने हमें अधिकार संपन्न बनाया और लोकतंत्र की नींव रखी, लेकिन आज उसे बचाने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान सबसे बड़ा है, क्योंकि वही सभी संस्थाओं का अधिकार क्षेत्र तय करता है। न्यायपालिका पर दबाव है और उसके फैसलों पर भाजपा नेता टिप्पणी करते हैं। जिन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। यह लोकतंत्र के लिए खतरे का संकेत है। बघेल ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार के कार्यकाल में संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है। साथ ही कहा कि निर्वाचन आयोग भाजपा की बंधुआ बन गई है। पहलगाम-झीरम दोनों घटनाओं में सुरक्षा में बड़ी चूक पूर्व सीएम ने हालिया पहलगाम आतंकी हमले और 12 साल पुराने झीरम घाटी नक्सली हमले के बीच समानता बताते हुए कहा- वहां धर्म पूछकर मारा गया, यहां नाम पूछकर मारा। उन्होंने इन दोनों घटनाओं में सुरक्षा चूक की ओर इशारा करते हुए पूछा कि 12 साल बाद भी झीरम के दोषी और आज के आतंकवादी कहां हैं? निर्वाचन आयोग भाजपा की बंधुआ बन गई बघेल ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग अब निष्पक्ष नहीं रह गया है, बल्कि भाजपा का बंधुआ मजदूर बन चुका है। उन्होंने कहा कि आयोग में सदस्यों की नियुक्ति अब प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की मर्जी से होती है। ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायतें की जाती हैं, लेकिन कोई जांच नहीं होती। भूपेश ने दावा किया कि कई लोकसभा सीटों पर जितने वोटर हैं, उससे ज्यादा वोट पड़े हैं और आयोग की वेबसाइट तक इसकी पुष्टि करती है। सीजफायर पर अमेरिकी दखल शर्मनाक भूपेश बघेल ने मोदी सरकार पर सवाल उठाया कि अमेरिका के राष्ट्रपति कौन होते हैं भारत में सीजफायर का आदेश देने वाले? उन्होंने हालिया पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद हुए सीजफायर को अमेरिका के दबाव में लिया गया निर्णय बताया और इसे देश के लिए शर्मनाक करार दिया। बघेल ने कहा कि मोदी जी से उनके वैचारिक मतभेद हैं, लेकिन वे केवल भाजपा के नहीं, पूरे देश के प्रधानमंत्री हैं। ऐसे में जब अमेरिका का राष्ट्रपति भारत को धमकी देता है और हमारे प्रधानमंत्री को अपमानित करता है, तो वे चुप क्यों रहते हैं? उन्होंने कहा कि देश की गरिमा की रक्षा हर हाल में होनी चाहिए, न कि विदेशी दबाव में फैसले लेने चाहिए।

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