भ्रष्टाचार के मामलों में 2.11 करोड़ की रिकवरी अटकी:रीवा में जेल वारंट के बाद भी गिरफ्तारी नहीं; पुलिस और प्रशासन केवल ‘पत्र’ लिख रहे

रीवा जिला पंचायत में भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर गंभीर प्रशासनिक लापरवाही और सिस्टम की नाकामी उजागर हुई है। पंचायत राज अधिनियम की धारा 92 के तहत कार्रवाई के नाम पर वर्षों से केवल पत्राचार किया जा रहा है। जमीनी हकीकत यह है कि न तो समय पर एफआईआर दर्ज हो रही है, न प्रभावी रिकवरी हो पा रही है और न ही दोषियों की गिरफ्तारी। नतीजा यह है कि जिले भर में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में करोड़ों रुपए की वसूली आज भी लंबित है। दस्तावेजों से यह साफ हो चुका है कि कई मामलों में जांच के बाद भ्रष्टाचार पूरी तरह प्रमाणित है, इसके बावजूद आरोपियों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं कराए गए। इससे प्रशासनिक सख्ती पर सवाल खड़े हो रहे हैं और यह संदेश जा रहा है कि पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार करने वालों को कानून का कोई भय नहीं है। पिपरहा पंचायत: सिस्टम के फेल होने का बड़ा उदाहरण जनपद पंचायत गंगेव की ग्राम पंचायत पिपरहा का मामला पूरे प्रशासनिक सिस्टम की असफलता का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है। यहां पंचायत भवन और आंगनवाड़ी भवन निर्माण में 4 लाख 22 हजार 103 रुपए के गबन का मामला वर्ष 2023 में ही उजागर हो गया था। भ्रष्टाचार साबित होने के दो साल बाद भी कार्रवाई आज तक प्रभावी रूप से अमल में नहीं आ सकी है। पूर्व सचिव को 2 साल में 11 नोटिस दस्तावेजों के मुताबिक, पिपरहा के पूर्व सचिव भैयालाल पाण्डेय को 21 मार्च 2023 से 27 जून 2025 के बीच कुल 11 बार नोटिस जारी किए गए। हर नोटिस में जिला पंचायत ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि अपहृत (गबन की गई) राशि पंचायत को लौटाई जाए और पंचायत के अभिलेख सौंपे जाएं। लेकिन आरोपी सचिव ने हर बार आदेश की अवहेलना की और प्रशासन देखता रहा। इस मामले में पूर्व सरपंच समयलाल साकेत को भी नोटिस जारी किया गया था। दोनों को सूचना दिए जाने के बावजूद जब राशि जमा नहीं की गई, तब जाकर अब सख्त कार्रवाई का रास्ता अपनाने की बात कही जा रही है। अक्टूबर में जारी हुआ जेल वारंट, पुलिस तामीली तक नहीं करा पाई आरोपी द्वारा लगातार अवहेलना करने के बाद जिला पंचायत ने अक्टूबर माह में ही भैयालाल पाण्डेय के खिलाफ सिविल जेल में परिरुद्ध करने का वारंट जारी किया था। इसके लिए थाना प्रभारी को वारंट की तामीली के लिए स्पष्ट रूप से निर्देशित भी किया गया था। हैरानी की बात है कि वारंट जारी होने के बावजूद तामीली नहीं हो पाई। न आरोपी की गिरफ्तारी हुई और न ही एक भी रुपया रिकवर किया जा सका। यह कार्रवाई भी सिर्फ कागज़ों तक ही सीमित रह गई। दोबारा जारी हुआ आदेश: 30 दिन की जेल का प्रावधान वारंट तामील न होने के बाद, अब जिला पंचायत रीवा के न्यायालय विहित प्राधिकारी एवं मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) द्वारा पुनः धारा 92(2) के तहत गिरफ्तारी और सिविल जेल में निरुद्ध करने का आदेश जारी किया गया है। इसमें अधिकतम 30 दिन या राशि जमा होने तक सिविल जेल में रखने का प्रावधान किया गया है। जिला पंचायत ने फिर से थाना प्रभारी को पत्र भेजकर निर्देशित किया है कि आरोपी को अभिरक्षा में लेकर वारंट की तामीली कराई जाए और पावती प्रस्तुत की जाए। यह स्थिति पुलिस और प्रशासनिक समन्वय पर गंभीर सवाल खड़े करती है। 2.11 करोड़ का लक्ष्य, मिले सिर्फ 54 लाख जिला पंचायत रीवा और मऊगंज में भ्रष्ट सचिवों और ग्राम रोजगार सहायकों (जीआरएस) से शासकीय राशि की वसूली की स्थिति बेहद चिंताजनक है। आंकड़ों पर नजर डालें तो दिसंबर 2025 तक करीब 2 करोड़ 11 लाख रुपए की रिकवरी होनी थी, लेकिन अब तक सिर्फ 54 लाख रुपए की ही वसूली हो सकी है। यह वसूली भी महज 31 सचिवों से हुई है। जिन राशियों की वसूली लंबित है, वे जनता के विकास कार्यों के लिए जारी की गई थीं। सूत्रों के मुताबिक, त्योंथर जनपद में सबसे ज्यादा गड़बड़ी सामने आई है। प्रशासनिक लापरवाही और कथित जानबूझकर की जा रही देरी ने जिला पंचायत प्रशासन की कार्यप्रणाली और नीयत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि लंबी निष्क्रियता के पीछे कहीं न कहीं ‘संरक्षण’ का खेल चल रहा है। आरटीआई कार्यकर्ता के सवाल: एफआईआर में देरी क्यों? आरटीआई और सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने इस मामले में प्रशासन को घेरा है। उनका कहना है कि जब भ्रष्टाचार वर्ष 2023 में ही साबित हो गया था, तो एफआईआर दर्ज करने में देरी क्यों की गई? उन्होंने सवाल उठाया कि अक्टूबर में जेल वारंट जारी होने और थाना प्रभारी को स्पष्ट निर्देश दिए जाने के बावजूद गिरफ्तारी क्यों नहीं हो सकी? द्विवेदी ने कहा, “सिर्फ पत्र और आदेश जारी करना प्रशासन की जिम्मेदारी की इतिश्री नहीं हो सकती। यदि समय रहते सख्त कार्रवाई होती, तो न राशि अटकती और न आरोपी इतने समय तक खुलेआम घूमते।” उनका कहना है कि पिपरहा पंचायत का मामला अकेला नहीं है, जिले में ऐसे कई मामलों में करोड़ों रुपए की रिकवरी अब भी पेंडिंग है। अब देखना होगा कि जिला पंचायत प्रशासन कागज़ों से निकलकर ज़मीन पर कब और कितनी सख्ती दिखाता है।

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