उज्जैन में संक्रांति पर्व पर बुधवार अलसुबह से श्रद्धालु स्नान के लिए शिप्रा नदी के रामघाट सहित दत्त अखाड़ा घाट और अन्य घाटों पर पहुंचने लगे। रामघाट पर सुबह से ही ठंड के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते नजर आए। श्रद्धालुओं ने पर्व स्नान के बाद दान-पुण्य भी किया। इस बार 14 और 15 जनवरी- दो दिन संक्रांति पर्व होने के कारण लोग दो दिन पर्व मना रहे हैं। बुधवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु मकर संक्रांति का त्योहार मनाने के लिए सुबह से ही शिप्रा तट पर स्नान, दान के साथ ही पूजन-पाठ करते नजर आए। आज घरों में तिल और गुड़ की मिठास रहेगी, वहीं सार्वजनिक स्थलों पर कई जगह पतंग महोत्सव का भी आयोजन किया जाएगा। मकर संक्रांति पर्व पर घाटों पर होने वाली भीड़ की सुरक्षा को देखते हुए होमगार्ड और एसडीआरएफ की टीमें लगातार घाटों पर सतत निगरानी कर रही हैं। आला अधिकारियों के मुताबिक होमगार्ड और एसडीआरएफ की टीमें घाटों पर मौजूद हैं, जो श्रद्धालुओं को गहरे पानी में न जाने की चेतावनी देती रहीं। दोपहर 3:05 बजे सूर्य की मकर संक्रांति पर्व की शुरुआत पंडित अमर डिब्बेवाला के अनुसार, 14 जनवरी को दोपहर 3:05 बजे सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करेगा। यानी दोपहर 3:05 बजे से सूर्य की मकर संक्रांति पर्व की शुरुआत होगी। किंतु दान-पुण्य की दृष्टि से इसका प्रभाव 15 जनवरी को माना जाएगा, क्योंकि धर्मशास्त्रों के अनुसार यदि सूर्य की संक्रांति दोपहर में या उसके बाद होती है, तो उसका पर्वकाल अगले दिन मनाया जाता है। चावल, मूंग की दाल, सुहाग की वस्तुएं आदि का दान करें संक्रांति का पर्वकाल और पुण्यकाल 15 जनवरी को मनाया जाएगा। इस दिन चावल, मूंग की दाल, सुहाग की वस्तुएं आदि का दान किया जा सकता है। वहीं गर्म ऊनी वस्त्रों के साथ-साथ गृह उपयोगी वस्तुओं का दान भी श्रेष्ठ माना गया है। 15 जनवरी को प्रातःकाल से लेकर दिवस पर्यंत दान-पुण्य की प्रक्रिया की जा सकती है। अमृत सिद्धि योग में आएगी मकर संक्रांति 14 जनवरी, बुधवार के दिन अनुराधा नक्षत्र होने से यह अमृत सिद्धि योग कहलाता है। शास्त्रीय अभिमत के अनुसार अमृत सिद्धि जैसे श्रेष्ठ योग में किए गए दान की विशेष मान्यता बताई गई है। इस योग में किया गया दान अक्षय माना जाता है। इस दृष्टि से इस योग में आने वाली संक्रांति पुण्यप्रद होती है, जो धन और पुत्र प्रदान करने वाली मानी जाती है। साथ ही यह पुण्य की वृद्धि करने वाली एवं पितरों को प्रसन्न करने वाली बताई गई है। इस दिन पितरों के निमित्त तीर्थ पर जलदान, पिंडदान अथवा सीधा दान, वस्त्रदान एवं पात्रदान करने से वंश वृद्धि होती है। इस दृष्टि से पितरों की सेवा अवश्य करनी चाहिए।


